Yajurveda / 3 / 3
तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्द्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य॥३॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 3 | Mantra No : 3
Seer : bhaaradvaajaH | Devta : agniH | Metre : nichRRit gaayatrii, | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : ta.m tvaa samidbhira~Ngiro ghRRitena varddhayaamasi. bRRihachChochaa yaviShThya .3.
Component Words : tam. tvaa. samidbhiriti samit.abhiH. a~NgiraH. ghRRitena. varddhayaamasi. bRRihat. shocha. yaviShThya .3.
In Hindi:
ऋषि : भारद्वाजः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत् गायत्री, | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यों को उक्त अग्नि की नित्य वृद्धि करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदपाठ : तम्। त्वा॒। स॒मि॒द्भिरिति॑ स॒मित्ऽभिः॑। अ॒ङ्गि॒रः॒। घृ॒तेन॑। व॒र्द्ध॒या॒म॒सि॒। बृ॒हत्। शो॒च॒। य॒वि॒ष्ठ्य॒॥३॥
पदार्थ : हम लोग जो (अङ्गिरः) पदार्थों को प्राप्त कराने वा (यविष्ठ्य) पदार्थों के भेद करने में अति बलवान् (बृहत्) बड़े तेज से युक्त अग्नि (शोच) प्रकाश करता है (तम्) उसको (समिद्भिः) काष्ठादि वा (घृतेन) घी आदि से (वर्द्धयामसि) बढ़ाते हैं॥३॥
भावार्थ : मनुष्यों को जो सब गुणों से बलवान् पूर्व कहा हुआ अग्नि है, वह होम और शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये लकड़ी, घी आदि साधनों से सेवन करके निरन्तर वृद्धियुक्त करना चाहिये॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : भारद्वाजः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत् गायत्री, | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यैः स नित्यं वर्द्धनीय इत्युपदिश्यते॥
पदपाठ : तम्। त्वा॒। स॒मि॒द्भिरिति॑ स॒मित्ऽभिः॑। अ॒ङ्गि॒रः॒। घृ॒तेन॑। व॒र्द्ध॒या॒म॒सि॒। बृ॒हत्। शो॒च॒। य॒वि॒ष्ठ्य॒॥३॥
पदार्थ : (तम्) भौतिकमग्निम् (त्वा) यः। अत्र व्यत्ययः (समिद्भिः) काष्ठादिभिः (अङ्गिरः) अङ्गति प्रापयति यः सोऽङ्गिरः। अङ्गाराऽअङ्कनाऽअञ्चनाः (निरु॰३.१७) (घृतेन) पूर्वोक्तेन (वर्द्धयामसि) वर्द्धयामः। अत्र इदन्तो मसि [अष्टा॰७.१.४६] इतीकारादेशः। (बृहत्) महत् यथा स्यात् तथा (शोच) शोचति प्रकाशते। अत्र व्यत्ययेन लडर्थे लोट्। द्व्यचोऽतस्तिङः [अष्टा॰६.३.१३५] इति दीर्घश्च। (यविष्ठ्य) योऽतिशयेन युवा पदार्थानाममिश्रीकरणे बलवान् सः। यविष्ठ एव यविष्ठ्यः। अत्र युवन् शब्दादिष्ठन् प्रत्ययस्ततो नवसूरमर्तयविष्ठेभ्यो यत् (अष्टा॰वा॰५.४.३६) इति वार्तिकेन स्वार्थे यत्प्रत्ययः। अयं मन्त्रः (शत॰१.३.३.२५-२६) व्याख्यातः॥३॥
अन्वय : वयं योऽङ्गिरोऽङ्गिरा यविष्ठ्य यविष्ठ्योग्निर्बृहच्छोचमहद् यथा स्यात्, तथा शोचति प्रकाशते त्वा तं समिद्भिर्घृतेन वर्द्धयामसि वर्द्धयामः प्रदीपयामः॥३॥
भावार्थ : मनुष्यैर्यो गुणैर्महान् पूर्वोक्तोऽग्निर्वर्त्तते, स होमशिल्पविद्यासिद्धये साधनैरिन्धनादिभिः सेवित्वा नित्यं वर्द्धनीय इति॥३॥