Yajurveda / 4 / 14
अग्ने॒ त्वꣳ सु जा॑गृहि व॒यꣳ सु म॑न्दिषीमहि। रक्षा॑ णो॒ऽअप्र॑युच्छन् प्र॒बुधे॑ नः॒ पुन॑स्कृधि॥१४॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 4 | Mantra No : 14
Seer : aa~NgirasaH | Devta : agniH | Metre : svaraaT aarShii uShNik, | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : agne tva.n su jaagRRihi vaya.n su mandiShiimahi. rakShaa No.aaprayuchChan prabudhe naH punaskRRidhi .14.
Component Words : agne. tvam. su. jaagRRihi. vayam. su. mandiShiimahi. rakSha. naH. aprayuchChannityapra.ayuchChan. prabudha iti pra.abudhe. na. punariti punaH. kRRidhi .14.
In Hindi:
ऋषि : आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट् आर्षी उष्णिक्, | स्वर : ऋषभः
विषय : फिर अग्नि के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदपाठ : अग्ने॑। त्वम्। सु। जा॒गृ॒हि॒। व॒यम्। सु। म॒न्दि॒षी॒म॒हि॒। रक्ष॑। नः॒। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। प्र॒बुध॒ इति॑ प्र॒ऽबुधे॑। न॒। पु॒न॒रिति॒ पुनः॑। कृ॒धि॒॥१४॥
पदार्थ : (अग्ने) जो अग्नि (प्रबुधे) जगने के समय (सुजागृहि) अच्छे प्रकार जगाता वा जिससे (वयम्) जगत् के कर्मानुष्ठान करने वाले हम लोग (सुमन्दिषीमहि) आनन्दपूर्वक सोते हैं, जो (अप्रयुच्छन्) प्रमादरहित होके (नः) प्रमादरहित हम लोगों की (रक्ष) रक्षा तथा प्रमादसहितों को नष्ट करता और जो (नः) हम लोगों के साथ (पुनः) बार-बार इसी प्रकार (कृधि) व्यवहार करता है, उसको युक्ति के साथ सब मनुष्यों को सेवन करना चाहिये॥१४॥
भावार्थ : मनुष्यों को जो अग्नि सोने, जागने, जीने तथा मरने का हेतु है, उसका युक्ति से सेवन करना चाहिये॥१४॥
In Sanskrit:
ऋषि : आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट् आर्षी उष्णिक्, | स्वर : ऋषभः
विषय : पुनरग्निगुणा उपदिश्यन्ते॥
पदपाठ : अग्ने॑। त्वम्। सु। जा॒गृ॒हि॒। व॒यम्। सु। म॒न्दि॒षी॒म॒हि॒। रक्ष॑। नः॒। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। प्र॒बुध॒ इति॑ प्र॒ऽबुधे॑। न॒। पु॒न॒रिति॒ पुनः॑। कृ॒धि॒॥१४॥
पदार्थ : (अग्ने) अयमग्निः (त्वम्) यः (सु) श्रैष्ठ्ये (जागृहि) जागर्त्ति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च (वयम्) कर्मानुष्ठातारो नित्यं जागरिताः (सु) शोभने (मन्दिषीमहि) शयीमहि (रक्ष) रक्षति। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङः। [अष्टा॰६.३.१३५] इति दीर्घः (नः) अस्मान् (अप्रयुच्छन्) प्रमादमकुर्वन् (प्रबुधे) जागरिते (नः) अस्मान् (पुनः) (कृधि) करोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च। अयं मन्त्रः (शत॰३.२.२.२२) व्याख्यातः॥१४॥
अन्वय : अग्ने त्वं योऽग्निः प्रबुधे नोऽस्मान् सुजागृहि सुष्ठु जागरयति, येन वयं सुमन्दिषीमहि, योऽप्रयुच्छन्नोस्मान् रक्ष रक्षति, प्रयुच्छतश्च हिनस्ति, यो नोऽस्मान् पुनः पुनरेवं कृधि करोति, सोऽस्माभिर्युक्त्या सम्यक् सेवनीयः॥१४॥
भावार्थ : मनुष्यैर्योऽग्निः शयनजागरणजीवनमरणहेतुरस्ति स युक्त्या संप्रयोक्तव्यः॥१४॥