Yajurveda / 10 / 10
अवे॑ष्टा दन्द॒शूकाः॒ प्राची॒मारो॑ह गाय॒त्री त्वा॑वतु रथन्त॒रꣳ साम॑ त्रि॒वृत् स्तोमो॑ वस॒न्तऽऋ॒तुर्ब्रह्म॒ द्रवि॑णम्॥१०॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 10 | Mantra No : 10
Seer : varuNaH | Devta : yajamaanaH | Metre : viraaT aarShii pa~Nkti, | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : aveShTaa dandashuukaaH praachiimaaroha gaayatrii tvaavatu rathantara.n saama trivRRit stomo vasanta.aRRiturbrahma draviNam .10.
Component Words : aveShTaa ityava.aiShTaaH. dandashuukaaH. praachiim. aa. roha. gaayatrii. tvaa. avatu. rathantaramiti ratham.ataram. saama. trivRRiditi tri.avRRit. stomaH. vasantaH. RRituH. brahma. draviNam .10.
In Hindi:
ऋषि : वरुणः | देवता : यजमानः | छन्द : विराट् आर्षी पङ्क्ति, | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर मनुष्य क्या करके किस-किस को प्राप्त हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदपाठ : अवे॑ष्टा॒ इत्यव॑ऽइष्टाः। द॒न्द॒शूकाः॑। प्राची॑म्। आ। रो॒ह॒। गा॒य॒त्री। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। साम॑। त्रि॒वृदिति॑ त्रि॒ऽवृत्। स्तोमः॑। व॒स॒न्तः। ऋ॒तुः। ब्रह्म॑। द्रवि॑णम्॥१०॥
पदार्थ : हे राजन्! जो आप (अवेष्टाः) विरोधी का सङ्ग करने वाले (दन्दशूकाः) दूसरों को दुःख देने के लिये काट खाने वाले हैं, उनको जीत के (प्राचीम्) पूर्व दिशा में (आरोह) प्रसिद्ध हों, उस (त्वा) आप को (गायत्री) पढ़ा हुआ गायत्री छन्द (रथन्तरम्) रथों से जिसके पार हों, ऐसा वन (साम) सामवेद (त्रिवृत्) तीन मन, वाणी और शरीर के बलों का बोध कराने वाला (स्तोमः) स्तुति के योग्य (वसन्तः) वसन्त (ऋतुः) ऋतु (ब्रह्म) वेद, ईश्वर और ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणकुलरूप (द्रविणम्) धन (अवतु) प्राप्त होवे॥१०॥
भावार्थ : जो मनुष्य विद्याओं में प्रसिद्ध होते हैं, वे शत्रुओं को जीत के ऐश्वर्य्य को प्राप्त हो सकते हैं॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वरुणः | देवता : यजमानः | छन्द : विराट् आर्षी पङ्क्ति, | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनर्मनुष्यैः किं कृत्वा किं किं प्राप्तव्यमित्युपदिश्यते॥
पदपाठ : अवे॑ष्टा॒ इत्यव॑ऽइष्टाः। द॒न्द॒शूकाः॑। प्राची॑म्। आ। रो॒ह॒। गा॒य॒त्री। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। साम॑। त्रि॒वृदिति॑ त्रि॒ऽवृत्। स्तोमः॑। व॒स॒न्तः। ऋ॒तुः। ब्रह्म॑। द्रवि॑णम्॥१०॥
पदार्थ : (अवेष्टाः) विरुद्धस्य सङ्गन्तारः (दन्दशूकाः) परस्मैदुःखप्रदानाय दंशनशीलाः (प्राचीम्) पूर्वा दिशम् (आ) (रोह) प्रसिद्धो भव (गायत्री) पठितं गायत्रीछन्दः (त्वा) त्वाम् (अवतु) प्राप्नोतु (रथन्तरम्) रथैस्तरन्ति येन तत् (साम) सामवेदः (त्रिवृत्) त्रिभिर्मनोवाक्शरीरबलानां बोधकारकः (स्तोमः) स्तूयमानः (वसन्तः) (ऋतुः) (ब्रह्म) वेदो जगदीश्वरो ब्रह्मवित्कुलं वा (द्रविणम्) विद्याद्रव्यम्॥ अयं मन्त्रः (शत॰ ५। ४। १। १-३) व्याख्यातः॥१०॥
अन्वय : हे राजन्! यस्त्वं येऽवेष्टा दन्दशूकाः सन्ति, तान् जित्वा प्राचीं दिशमारोह, तं त्वा गायत्री रथन्तरं साम त्रिवृत् स्तोम् ऋतुर्वसन्तो ब्रह्म द्रविणं चावतु॥१०॥
भावार्थ : ये मनुष्याः विद्यासु प्रादुर्भवन्ति ते शत्रून् विजित्यैश्वर्यं प्राप्नुवन्ति॥१०॥