Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Yajurveda / 11 / 13

यु॒ञ्जाथा॒ रास॑भं यु॒वम॒स्मिन् यामे॑ वृषण्वसू। अ॒ग्निं भर॑न्तमस्म॒युम्॥१३॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 11 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : कुश्रिः | देवता : वाजी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या कहां जोड़ना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : यु॒ञ्जाथा॑म्। रास॑भम्। यु॒वम्। अ॒स्मिन्। यामे॑। वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू। अ॒ग्निम्। भर॑न्तम्। अ॒स्म॒युमित्य॑स्म॒ऽयुम्॥१३॥

पदार्थ : हे (वृषण्वसू) सूर्य्य और वायु के समान सुख वर्षाने वा सुख में बसने हारे कारीगर तथा उसके स्वामी लोगो! (युवम्) तुम दोनों (अस्मिन्) इस (यामे) यान में (रासभम्) जल और अग्नि के वेगगुणरूप अश्व तथा (अस्मयुम्) हम को ले चलने तथा (भरन्तम्) धारण करने हारे (अग्निम्) प्रसिद्ध वा बिजुली रूप अग्नि को (युञ्जाथाम्) युक्त करो॥१३॥

भावार्थ : जो मनुष्य इस विमान आदि यान में यन्त्र, कला, जल और अग्नि के प्रयोग करते हैं, वे सुख से दूसरे देशों में जाने को समर्थ होते हैं॥१३॥