Yajurveda / 11 / 58
वस॑वस्त्वा कृण्वन्तु गाय॒त्रेण॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वासि॑ पृथि॒व्य᳖सि धा॒रया॒ मयि॑ प्र॒जा रा॒यस्पोषं॑ गौप॒त्यꣳ सु॒वीर्य॑ꣳ सजा॒तान् यज॑मानाय रु॒द्रास्त्वा॑ कृण्वन्तु॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वास्य॒न्तरि॑क्षमसि धा॒रया॒ मयि॑ प्र॒जा रा॒यस्पोषं॑ गौप॒त्यꣳ सु॒वीर्य॑ꣳ सजा॒तान् यज॑मानायाऽऽदि॒त्यास्त्वा॑ कृण्वन्तु॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वासि॒ द्यौर॑सि धा॒रया॒ मयि॑ प्र॒जा रा॒यस्पोषं॑ गौप॒त्यꣳ सु॒वीर्य॑ꣳ सजा॒तान् यज॑मानाय विश्वे॑ त्वा दे॒वाः वैश्वा॑न॒राः कृ॑ण्व॒न्त्वानु॑ष्टुभेन॒ छन्द॑साऽङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वासि॒ दिशो॑ऽसि धा॒रया॒ मयि॑ प्र॒जा रा॒यस्पोषं॑ गौप॒त्यꣳ सु॒वीर्य॑ꣳ सजा॒तान् यज॑मानाय॥५८॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 11 | Mantra No : 58
Seer : sindhudviipaH | Devta : vasurudraadityavishvedevaaH | Metre : puurvaaddhasya svaraaTsa.mkRRitiH, uttaraardhasyaabhikRRitiH | Tone : gaandhaaraH, RRIShabhaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : vasavastvaa kRRiNvantu gaayatreNa Chandasaa.a~Ngirasvad dhruvaasi pRRithivya.nsi dhaarayaa mayi prajaa.n raayaspoSha.m gaupatya.n suviirya.n sajaataan yajamaanaaya rudraastvaa kRRiNvantu traiShTubhena Chandasaa.a~Ngirasvad dhruvaasyantarikShamasi dhaarayaa mayi prajaa.n raayaspoSha.m gaupatya.n suviirya.n sajaataan yajamaanaayaa.a.adityaastvaa kRRiNvantu jaagatena Chandasaa.a~Ngirasvad dhruvaasi dyaurasi dhaarayaa mayi prajaa.n raayaspoSha.m gaupatya.n suviirya.n sajaataan yajamaanaaya vishve tvaa devaaH vaishvaanaraaH kRRiNvantvaanuShTubhena Chandasaa.a~Ngirasvad dhruvaasi disho.asi dhaarayaa mayi prajaa.n raayaspoSha.m gaupatya.n suviirya.n sajaataan yajamaanaaya .58 .
Component Words : vasavaH. tvaa. kRRiNvantu. gaayatreNa. Chandasaa. a~Ngirasvat. dhruvaa. asi. pRRithivii. asi. dhaaraya. mayi. prajaamiti pra.ajaam. raayaH. poSham. gaupatyam. suviiryyamiti su.aviiryyam. sajaataaniti sa.ajaataan. yajamaanaaya. rudraaH. tvaa. kRRiNvantu. traiShTubhena. traistubheneti trai.astubhena. Chandasaa. a~Ngirasvat. dhruvaa. asi. antarikSham. asi. dhaaraya. mayi. prajaamiti pra.ajaam. raayaH. poSham. gaupatyam. suviiryyamiti su.aviiryyam. sajaataaniti sa.ajaataan. yajamaanaaya. aadityaaH. tvaa. kRRiNvantu. jaagatena. Chandasaa. a~Ngirasvat. dhruvaa. asi. dyauH. asi. dhaaraya. mayi. prajaamiti pra.ajaam. raayaH. poSham. gaupatyam. suviiryamiti suviiryam. sajaataaniti sa.ajaataan. yajamaanaaya. vishve. tvaa. devaaH. vaishvaanaraaH. kRRiNvantu. aanuShTubhena. aanustubhenetyaanu.astubhena. Chandasaa. a~Ngirasvat. dhruvaa. asi. dishaH. asi. dhaaraya. mayi. prajaamiti pra.ajaam. raayaH. poSham. gaupatyam. suviiryamiti su.aviiryam. sajaataaniti sa.ajaataan. yajamaanaaya
In Hindi:
ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : वसुरुद्रादित्यविश्वेदेवाः | छन्द : पूर्वाद्धस्य स्वराट्संकृतिः, उत्तरार्धस्याभिकृतिः | स्वर : गान्धारः, ऋषभः
विषय : फिर स्त्री-पुरुष क्या करके क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदपाठ : वस॑वः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। पृ॒थि॒वी। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। रु॒द्राः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। अ॒न्तरि॑क्षम्। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। आ॒दि॒त्याः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। द्यौः। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य॒मिति॑ सु॒वीर्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। विश्वे॑। त्वा॒। दे॒वाः। वै॒श्वा॒न॒राः। कृ॒ण्व॒न्तु॒। आनु॑ष्टुभेन। आनु॑स्तुभे॒नेत्यानु॑ऽस्तुभेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। दिशः॑। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय॥५८॥
पदार्थ : हे ब्रह्मचारिणी कुमारी स्त्री! जो तू (अङ्गिरस्वत्) धनञ्जय प्राणवायु के समतुल्य (ध्रुवा) निश्चल (असि) है और (पृथिव्यसि) विस्तृत सुख करने हारी है उस (त्वा) तुझ को (गायत्रेण) वेद में विधान किये (छन्दसा) गायत्री आदि छन्दों से (वसवः) चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य रखने वाले विद्वान् लोग मेरी स्त्री (कृण्वन्तु) करें। हे कुमार ब्रह्मचारी पुरुष! जो तू (अङ्गिरस्वत्) प्राणवायु के समान निश्चल है और (पृथिवी) पृथिवी के समान क्षमायुक्त (असि) है जिस (त्वा) तुझ को (वसवः) उक्त वसुसंज्ञक विद्वान् लोग (गायत्रेण) वेद में प्रतिपादन किये (छन्दसा) गायत्री आदि छन्दों से मेरा पति (कृण्वन्तु) करें। सो तू (मयि) अपनी प्रिय पत्नी मुझ में (प्रजाम्) सुन्दर सन्तानों (रायः) धन की (पोषम्) पुष्टि (गौपत्यम्) गौ, पृथिवी वा वाणी के स्वामीपन और (सुवीर्य्यम्) सुन्दर पराक्रम को (धारय) स्थापन कर। मैं तू दोनों (सजातान्) एक गर्भाशय से उत्पन्न हुए सब सन्तानों को (यजमानाय) विद्या देने हारे आचार्य्य को विद्या ग्रहण के लिये समर्पण करें। हे स्त्रि! जो तू (अङ्गिरस्वत्) आकाश के समान (ध्रुवा) निश्चल (असि) है और (अन्तरिक्षम्) अविनाशी प्रेमयुक्त (असि) है उस (त्वा) तुझको (रुद्राः) रुद्रसंज्ञक चवालीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य सेवने हारे विद्वान् लोग (त्रैष्टुभेन) वेद में कहे हुए (छन्दसा) त्रिष्टुप् छन्द से मेरी स्त्री (कृण्वन्तु) करें। हे वीर पुरुष! जो तू आकाश के समान निश्चल है और दृढ़ प्रेम से युक्त है, जिस तुझ को चवालीस वर्ष ब्रह्मचर्य करने हारे विद्वान् लोग वेद में प्रतिपादन किये त्रिष्टुप् छन्द से मेरा स्वामी करें। वह तू (मयि) अपनी प्रिय पत्नी मुझ में (प्रजाम्) बल तथा सत्य धर्म से युक्त सन्तानों (रायः) राज्यलक्ष्मी की (पोषम्) पुष्टि (गौपत्यम्) पढ़ाने के अधिष्ठातृत्व और (सुवीर्य्यम्) अच्छे पराक्रम को (धारय) धारण कर मैं तू दोनों (सजातान्) एक उदर से उत्पन्न हुए सब सन्तानों को अच्छी शिक्षा देकर वेदविद्या की शिक्षा होने के लिये (यजमानाय) अङ्ग-उपाङ्गों के सहित वेद पढ़ाने हारे अध्यापक को देवें। हे विदुषी स्त्री! जो तू (अङ्गिरस्वत्) आकाश के समान (ध्रुवा) अचल (असि) है (द्यौः) सूर्य के सदृश प्रकाशमान (असि) है उस (त्वा) तुझ को (आदित्याः) अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य करके पूर्ण विद्या और बल की प्राप्ति से आप्त सत्यवादी धर्मात्मा विद्वान् लोग (जागतेन) वेद में कहे (छन्दसा) जगती छन्द से मेरी पत्नी (कृण्वन्तु) करें। हे विद्वान् पुरुष! जो तू आकाश के तुल्य दृढ़ और सूर्य्य के तुल्य तेजस्वी है, उस तुझ को अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य सेवने वाले पूर्ण विद्या से युक्त धर्मात्मा विद्वान् लोग वेदोक्त जगती छन्द से मेरा पति करें। वह तू (मयि) अपनी प्रिय भार्य्या मुझ में (प्रजाम्) शुभ गुणों से युक्त सन्तानों (रायः) चक्रवर्त्ति-राज्यलक्ष्मी को (पोषम्) पुष्टि (गौपत्यम्) संपूर्ण विद्या के स्वामीपन और (सुवीर्यम्) सुन्दर पराक्रम को (धारय) धारण कर। मैं तू दोनों (सजातान्) अपने सन्तानों को जन्म से उपदेश करके सब विद्या ग्रहण करने के लिये (यजमानाय) क्रिया-कौशल के सहित सब विद्याओं के पढ़ाने हारे आचार्य को समर्पण करें। हे सुन्दर ऐश्वर्य्ययुक्त पत्नि! जो तू (अङ्गिरस्वत्) सूत्रात्मा प्राणवायु के समान (ध्रुवा) निश्चल (असि) है और (दिशः) सब दिशाओं में कीर्तिवाली (असि) है, उस तुझ को (वैश्वानराः) सब मनुष्यों में शोभायमान (विश्वे) सब (देवाः) उपदेशक विद्वान् लोग (आनुष्टुभेन) वेद में कहे (छन्दसा) अनुष्टुप् छन्द से मेरे आधीन (कृण्वन्तु) करें। हे पुरुष! जो तू सूत्रात्मा वायु के सदृश स्थित है (दिशः) सब दिशाओं में कीर्तिवाला (असि) है, जिस (त्वा) तुझ को सब प्रजा में शोभायमान सब विद्वान् लोग मेरे आधीन करें। सो आप (मयि) मुझ में (प्रजाम्) शुभलक्षणयुक्त सन्तानों (रायः) सब ऐश्वर्य्य की (पोषम्) पुष्टि (गौपत्यम्) वाणी की चतुराई और (सुवीर्य्यम्) सुन्दर पराक्रम को (धारय) धारण कर। मैं तू दोनों जने अच्छा उपदेश होने के लिये (सजातान्) अपने सन्तानों को (यजमानाय) सत्य के उपदेशक अध्यापक के समीप समर्पण करें॥५८॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे की परीक्षा करके आपस में दृढ़ प्रीति वाले होवें, तब वेदोक्त रीति से यज्ञ का विस्तार और वेदोक्त नियमाऽनुसार विवाह करके धर्म से सन्तानों को उत्पन्न करें। जब तक कन्या और पुत्र आठ वर्ष के हों, तब तक माता-पिता उनको अच्छी शिक्षा देवें। इस के पीछे ब्रह्मचर्य्य धारण करा के विद्या पढ़ने के लिये अपने घर से बहुत दूर आप्त विद्वान् पुरुषों और आप्त विदुषी स्त्रियों की पाठशालाओं में भेज देवें। वहां पाठशाला में जितने धन का खर्च करना उचित हो उतना करें, क्योंकि सन्तानों को विद्यादान के विना कोई उपकार वा धर्म नहीं बन सकता। इसलिये इस का निरन्तर अनुष्ठान किया करें॥५८॥
In Sanskrit:
ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : वसुरुद्रादित्यविश्वेदेवाः | छन्द : पूर्वाद्धस्य स्वराट्संकृतिः, उत्तरार्धस्याभिकृतिः | स्वर : गान्धारः, ऋषभः
विषय : पुनर्दम्पती किङ्कृत्वा किङ्कुर्य्यातामित्युपदिश्यते।
पदपाठ : वस॑वः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। पृ॒थि॒वी। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। रु॒द्राः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। अ॒न्तरि॑क्षम्। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। आ॒दि॒त्याः। त्वा॒। कृ॒ण्व॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। द्यौः। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य॒मिति॑ सु॒वीर्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय। विश्वे॑। त्वा॒। दे॒वाः। वै॒श्वा॒न॒राः। कृ॒ण्व॒न्तु॒। आनु॑ष्टुभेन। आनु॑स्तुभे॒नेत्यानु॑ऽस्तुभेन। छन्द॑सा। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। दिशः॑। अ॒सि॒। धा॒रय॑। मयि॑। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रा॒यः। पोष॑म्। गौ॒प॒त्यम्। सु॒वीर्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य॑म्। स॒जा॒तानिति॑ सऽजा॒तान्। यज॑मानाय॥५८॥
पदार्थ : (वसवः) वसुसंज्ञका विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (कृण्वन्तु) (गायत्रेण) वेदविहितेन (छन्दसा) (अङ्गिरस्वत्) धनञ्जयप्राणवत् (ध्रुवा) निश्चला (असि) (पृथिवी) पृथुसुखकारिणी (असि) (धारय) स्थापय अत्र अन्येषामपि दृश्यते [अष्टा॰६.३.१३७] इति दीर्घः। (मयि) त्वत्प्रीतायां पत्न्याम् (प्रजाम्) सुसन्तानम् (रायः) धनस्य (पोषम्) पुष्टिम् (गौपत्यम्) गोर्धेनोः पृथिव्या वाचो वा पतिस्तस्य भावम् (सुवीर्य्यम्) शोभनं च तद्वीर्य्यं च तत् (सजातान्) समानात् प्रादुर्भावादुत्पन्नान् (यजमानाय) विद्यासङ्गमयित्र आचार्य्याय (रुद्राः) रुद्रसंज्ञका विद्वांसः (त्वा) (कृण्वन्तु) (त्रैष्टुभेन) (छन्दसा) (अङ्गिरस्वत्) आकाशवत् (ध्रुवा) अक्षुब्धा (असि) (अन्तरिक्षम्) अक्षयप्रेमयुक्ता (असि) (धारय) (मयि) (प्रजाम्) सत्यबलधर्मयुक्ताम् (रायः) राजश्रियः (पोषम्) (गौपत्यम्) अध्यापकत्वम् (सुवीर्य्यम्) सुष्ठु पराक्रमम् (सजातान्) (यजमानाय) साङ्गोपाङ्गवेदाध्यापकाय (आदित्याः) पूर्णविद्याबलप्राप्त्या विपश्चितः (त्वा) (कृण्वन्तु) (जागतेन) (छन्दसा) (अङ्गिरस्वत्) (ध्रुवा) निष्कम्पा (असि) (द्यौः) सूर्य्य इव वर्त्तमानः (असि) (धारय) (मयि) (प्रजाम्) सुप्रजाताम् (रायः) चक्रवर्त्तिराज्यलक्ष्म्याः (पोषम्) (गौपत्यम्) सकलविद्याधिस्वामित्वम् (सुवीर्य्यम्) (सजातान्) (यजमानाय) क्रियाकौशलसहितानां सर्वासां विद्यानां प्रवक्त्रे (विश्वे) सर्वे (त्वा) (देवाः) उपदेशका विद्वांसः (वैश्वानराः) ये विश्वेषु नायकेषु राजन्ते (कृण्वन्तु) (आनुष्टुभेन) (छन्दसा) (अङ्गिरस्वत्) सूत्रात्मप्राणवत् (ध्रुवा) सुस्थिरा (असि) (दिशः) सर्वासु दिक्षु व्याप्तकीर्त्तिः (असि) (धारय) (मयि) (प्रजाम्) (रायः) समग्रैश्वर्य्यस्य (पोषम्) (गौपत्यम्) वाक्चातुर्य्यम् (सुवीर्य्यम्) (सजातान्) (यजमानाय) सत्योपदेशकाय। [अयं मन्त्रः शत॰६.५.२.३ व्याख्यातः]॥५८॥
अन्वय : हे ब्रह्मचारिणि कुमारिके! या त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवासि पृथिव्यसि तां त्वा गायत्रेण छन्दसा वसवो मम स्त्रियं कृण्वन्तु। हे कुमार ब्रह्मचारिन्! यस्त्वङ्गिरस्वद् ध्रुवोऽसि भूमिवत् क्षमावानसि यं त्वा वसवो गायत्रेण छन्दसा मम पतिं कृण्वन्तु स त्वं मयि प्रजां रायस्पोषं गौपत्यं सुवीर्य्यं च धारय। आवां सजातान् संतानान् सर्वान् यजमानाय विद्याग्रहणार्थं समर्पयेव। हे स्त्रि! या त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवोऽस्यन्तरिक्षमसि तां त्वा रुद्रास्त्रैष्टुभेन छन्दसा मम पत्नीं कृण्वन्तु। हे वीर! यस्त्वङ्गिरस्वद् ध्रुवोऽस्यन्तरिक्षमसि यं त्वा रुद्रास्त्रैष्टुभेन छन्दसा मम स्वामिनं कृण्वन्तु। स त्वं मयि प्रजां रायस्पोषं गौपत्यं सुवीर्य्यं च धारय। आवां सजातान् सुशिक्ष्य वेदशिक्षाध्ययनाय यजमानाय प्रदद्याव। हे विदुषि! या त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवाऽसि द्यौरसि तां त्वादित्या जागतेन छन्दसा मम भार्य्यां कृण्वन्तु। हे विद्वन्! यस्त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवोऽसि द्यौरसि यं त्वादित्या जागतेन छन्दसा ममाधिष्ठातारः कृण्वन्तु। स त्वं मयि प्रजां रायस्पोषं गौपत्यं सुवीर्य्यं च धारय। आवां सजातान् जन्मतः सूपदिश्य सर्वविद्याग्रहणार्थं यजमानाय समर्प्पयेव। हे सुभगे! या त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवासि दिशोऽसि तां त्वा वैश्वानरा विश्वे देवा आनुष्टुभेन छन्दसा मदधीनां कृण्वन्तु। हे पुरुष! यस्त्वमङ्गिरस्वद् ध्रुवोऽसि दिशोऽसि यं त्वा वैश्वानरा विश्वेदेवा मदधीनं कृण्वन्तु, स त्वं मयि प्रजां रायस्पोषं गौपत्यं सुवीर्य्यं च धारय। आवां सूपदेशार्थं सजातान् यजमानाय समर्प्पयेव॥५८॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। यदा स्त्रीपुरुषौ परस्परं परीक्षां कृत्वाऽन्योन्यं दृढप्रीतौ स्याताम्। तदा वेदविधिना यज्ञं प्रतत्य वेदोक्तनियमान् स्वीकृत्य विवाहं विधाय धर्मेण संतानान्युत्पाद्य यावदष्टवार्षिकाः पुत्राः पुत्र्यश्च भवेयुस्तावन्मातापितरौ तान् सुशिक्षयेतामत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्य्यं ग्राहयित्वा विद्याध्ययनाय स्वगृहादतिदूरे आप्तानां विदुषां विदुषीणां च पाठशालासु प्रेषयेताम्। अत्र यावतो धनस्य व्ययः कर्त्तुं योग्योऽस्ति, तावन्तं कुर्य्याताम्, नहि संतानानां विद्यादानमन्तरा कश्चिदुपकारो धर्मश्चास्ति। तस्मादेतत् सततं समाचरेताम्॥५८॥