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Yajurveda / 12 / 45

अपे॑त॒ वी᳖त॒ वि च॑ सर्प॒तातो॒ येऽत्र॒ स्थ पु॑रा॒णा ये च॒ नूत॑नाः। अदा॑द्य॒मो᳖ऽव॒सानं॑ पृथि॒व्याऽअक्र॑न्नि॒मं पि॒तरो॑ लो॒कम॑स्मै॥४५॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 12 | Mantra No : 45

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिः | देवता : पितरः | छन्द : निचृदार्षी त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : सन्तान और पिता-माता परस्पर किन-किन कर्मों का आचरण करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : अप॑। इ॒त॒। वि। इ॒त॒। वि। च॒। स॒र्प॒त॒। अतः॑। ये। अत्र॑। स्थ। पु॒रा॒णाः। ये। च॒। नूत॑नाः। अदा॑त्। य॒मः। अ॒व॒सान॒मित्य॑व॒ऽसान॑म्। पृ॒थि॒व्याः। अक्र॑न्। इ॒मम्। पि॒तरः॑। लो॒कम्। अ॒स्मै॒॥४५॥

पदार्थ : हे विद्वान् लोगो! जो (ये) जो (अत्र) इस समय (पृथिव्याः) भूमि के बीच वर्त्तमान (पुराणाः) प्रथम विद्या पढ़ चुके (च) और (ये) जो (नूतनाः) वर्त्तमान समय में विद्याभ्यास करने हारे (पितरः) पिता=पढ़ाने, उपदेश करने और परीक्षा करने वाले (स्थ) होवें, वे (अस्मै) इस सत्यसंकल्पी मनुष्य के लिये (इमम्) इस (लोकम्) वैदिक ज्ञान सिद्ध लोक को (अक्रन्) सिद्ध करें। जिन तुम लोगों को (यमः) प्राप्त हुआ परीक्षक पुरुष (अवसानम्) अवकाश वा अधिकार को (अदात्) देवे, वे तुम लोग (अतः) इस अधर्म से (अपेत) पृथक् रहो और धर्म्म को (वीत) विशेष कर प्राप्त होओ (अत्र) और इसी में (विसर्पत) विशेषता से गमन करो॥४५॥

भावार्थ : माता-पिता और आचार्य्य का यही परम धर्म है-जो सन्तानों के लिये विद्या और अच्छी शिक्षा को प्राप्त कराना। जो अधर्म से पृथक् और धर्म्म से युक्त परोपकार में प्रीति रखने वाले वृद्ध और जवान विद्वान् लोग हैं, वे निरन्तर सत्य उपदेश से अविद्या का निवारण और विद्या की प्रवृत्ति करके कृतकृत्य होवें॥४५॥