Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Yajurveda / 12 / 101

त्वमु॑त्त॒मास्यो॑षधे॒ तव॑ वृ॒क्षाऽउप॑स्तयः। उप॑स्तिरस्तु॒ सो᳕ऽस्माकं॒ योऽअ॒स्माँ२ऽ अ॑भि॒दास॑ति॥१०१

Veda : Yajurveda | Chapter : 12 | Mantra No : 101

In Hindi:

ऋषि : वरुणः | देवता : भिषजः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर वह ओषधि किस प्रकार की है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : त्वम्। उ॒त्त॒मेत्यु॑त्त॒मा। अ॒सि॒। ओ॒ष॒धे॒। तव॑। वृ॒क्षाः। उप॑स्तयः। उप॑स्तिः। अ॒स्तु॒। सः। अ॒स्माक॑म्। यः। अ॒स्मान्। अ॒भि॒दास॒तीत्य॑भि॒ऽदास॑ति॥१०१॥

पदार्थ : हे वैद्यजन! (यः) जो (अस्मान्) हमको (अभिदासति) अभीष्ट सुख देता है, (सः) वह (त्वम्) तू (अस्माकम्) हमारा (उपस्तिः) संगी (अस्तु) हो, जो (उत्तमा) उत्तम (ओषधे) ओषधि (असि) है, (तव) जिसके (वृक्षाः) वट आदि वृक्ष (उपस्तयः) समीप इकट्ठे होनेवाले हैं, उस ओषधि से हमारे लिये सुख दे॥१०१॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि विरोधी वैद्य की और विरोधी मित्र की ओषधि कभी न ग्रहण करें, किन्तु जो वैद्यकशास्त्रज्ञ, जिसका कोई शत्रु न हो, धर्मात्मा, सब का मित्र, सर्वोपकारी है, उससे ओषधिविद्या ग्रहण करें॥१०१॥