Yajurveda / 13 / 11
प्रति॒ स्पशो॒ विसृ॑ज॒ तूर्णि॑तमो॒ भवा॑ पा॒युर्वि॒शोऽ अ॒स्या अद॑ब्धः। यो नो॑ दू॒रेऽ अ॒घश॑ꣳसो॒ योऽ अन्त्यग्ने॒ माकि॑ष्टे॒ व्यथि॒राद॑धर्षीत्॥११॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 13 | Mantra No : 11
Seer : vaamadevaH | Devta : agniH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : prati spasho visRRija tuurNitamo bhavaa paayurvisho.a asyaa adabdhaH. yo no duure.a aghasha.nso yo.a antyagne maakiShTe vyathiraadadharShiit .11 .
Component Words : prati. spashaH. vi. sRRija. tuurNitama iti tuurNi.atamaH. bhava. paayuH. vishaH. asyaaH. adabdhaH. yaH. naH. duure. aghasha.nsa ityagha.asha.nsaH. yaH. anti. agne. maakiH. te. vyathiH. aa. dadharShiit .11 .
In Hindi:
ऋषि : वामदेवः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदपाठ : प्रति॑। स्पशः॑। वि। सृ॒ज॒। तूर्णि॑तम॒ इति॒ तूर्णि॑ऽतमः। भव॑। पा॒युः। वि॒शः। अ॒स्याः। अद॑ब्धः। यः। नः॒। दू॒रे। अ॒घश॑ꣳस॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः। यः। अन्ति॑। अग्ने॑। माकिः॑। ते॒। व्यथिः॑। आ। द॒ध॒र्षी॒त्॥११॥
पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के समान शत्रुओं के जलाने वाले पुरुष! (ते) आपका और (नः) हमारा (यः) जो (व्यथिः) व्यथा देने हारा (अघशंसः) पाप करने में प्रवृत्त चोर शत्रुजन (दूरे) दूर तथा (यः) जो (अन्ति) निकट है, जैसे वह हम लोगों को (माकिः) नहीं (आ, दधर्षीत्) दुःख देवे, उस शत्रु के (प्रति) प्रति आप (तूर्णितमः) शीघ्र दण्डदाता होके (स्पशः) बन्धनों को (विसृज) रचिये और (अस्याः) इस वर्त्तमान (विशः) प्रजा के (पायुः) रक्षक (अदब्धः) हिंसारहित (भव) हूजिये॥११॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो समीप वा दूर रहने वाले प्रजाओं के दुःखदायी डाकू हैं, उनको राजा आदि पुरुष साम, दाम, दण्ड और भेद से शीघ्र वश में लाके दया और न्याय से धर्मयुक्त प्रजाओं की निरन्तर रक्षा करें॥११॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनः स कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते॥
पदपाठ : प्रति॑। स्पशः॑। वि। सृ॒ज॒। तूर्णि॑तम॒ इति॒ तूर्णि॑ऽतमः। भव॑। पा॒युः। वि॒शः। अ॒स्याः। अद॑ब्धः। यः। नः॒। दू॒रे। अ॒घश॑ꣳस॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः। यः। अन्ति॑। अग्ने॑। माकिः॑। ते॒। व्यथिः॑। आ। द॒ध॒र्षी॒त्॥११॥
पदार्थ : (प्रति) (स्पशः) बाधनानि (वि) (सृज) (तूर्णितमः) अतिशयेन त्वरिता (भव) द्व्यचोऽतस्तिङः [अष्टा॰६.३.१३५] इति दीर्घः। (पायुः) रक्षकः (विशः) प्रजायाः (अस्याः) वर्त्तमानायाः (अदब्धः) अहिंसकः (यः) (नः) अस्माकम् (दूरे) विप्रकृष्टे (अघशंसः) योऽघं पापं कर्तुं शंसति स स्तेनः (यः) (अन्ति) निकटे (अग्ने) अग्निवच्छत्रुदाहक (माकिः) निषेधे। अत्र मकि धातोर्बाहुलकादिञ् नुमभावश्च (ते) तव (व्यथिः) व्यथकः शत्रुः (आ) (दधर्षीत्) धर्षेत्। अत्र वाच्छन्दसि [अष्टा॰वा॰६.१.८] इति द्विर्वचनम्॥११॥
अन्वय : हे अग्ने! ते तव नोऽस्माकं च यो व्यथिरघशंसो दूरे योऽन्त्यस्ति, यथा सोऽस्मान् माकिरादधर्षीत्, तं प्रति त्वं तूर्णितमः सन् स्पशो विसृज अस्या विशः पायुरदब्धो भव॥११॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये निकटदूरस्थाः प्रजाभ्यो दुःखप्रदा दस्यवः सन्ति, तान् राजादयः सामदामदण्डभेदैः सद्यो वशं नीत्वा दयान्यायाभ्यां धार्मिकीः प्रजाः सततं पालयेयुः॥११॥