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Yajurveda / 13 / 48

इ॒मं मा हि॑ꣳसी॒रेक॑शफं प॒शुं क॑निक्र॒दं वा॒जिनं॒ वाजि॑नेषु। गौ॒रमा॑र॒ण्यमनु॑ ते दिशामि॒ तेन॑ चिन्वा॒नस्त॒न्वो᳕ निषी॑द। गौ॒रं ते॒ शुगृ॑च्छतु॒ यं द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु॥४८॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 13 | Mantra No : 48

In Hindi:

ऋषि : विरूपः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद् ब्राह्मी पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर यह मनुष्य क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : इ॒मम्। मा। हि॒ꣳसीः॒। एक॑शफ॒मित्येक॑ऽशफम्। प॒शुम्। क॒नि॒क्र॒दम्। वा॒जिन॑म्। वाजि॑नेषु। गौ॒रम्। आ॒र॒ण्यम्। अनु॑। ते॒। दि॒शा॒मि॒। तेन॑। चि॒न्वा॒नः। त॒न्वः᳖। नि। सी॒द॒। गौ॒रम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒॥४७॥

पदार्थ : हे राजन्! तू (वाजिनेषु) संग्राम के कामों में (इमम्) इस (एकशफम्) एक खुरयुक्त (कनिक्रदम्) शीघ्र विकल व्यथा को प्राप्त हुए (वाजिनम्) वेगवाले (पशुम्) देखने योग्य घोड़े आदि पशु को (मा) (हिंसीः) मत मार। मैं ईश्वर (ते) तेरे लिये (यम्) जिस (आरण्यम्) जङ्गली (गौरम्) गौरपशु की (दिशामि) शिक्षा करता हूँ, (तेन) उसके रक्षण से (चिन्वानः) वृद्धि को प्राप्त हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निरन्तर स्थिर हो, (ते) तेरे से (गौरम्) श्वेत वर्ण वाले पशु के प्रति (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे और (यम्) जिस शत्रु को हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, (तम्) उसको (ते) तुझ से (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे॥४८॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि एक खुर वाले घोड़े आदि पशुओं और उपकारक वन के पशुओं को भी कभी न मारें। जिनके मारने से जगत् की हानि और न मारने से सब का उपकार होता है, उनका सदैव पालन- पोषण करें और जो हानिकारक पशु हों, उन को मारें॥४८॥