Yajurveda / 17 / 3
ऋ॒तव॑ स्थऽऋता॒वृध॑ऽऋतु॒ष्ठा स्थ॑ऽऋता॒वृधः॑। घृ॒त॒श्च्युतो॑ मधु॒श्च्युतो॑ वि॒राजो॒ नाम॑ काम॒दुघा॒ऽअक्षी॑यमाणाः॥३॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 17 | Mantra No : 3
Seer : medhaatithiH | Devta : agniH | Metre : viraaDaarShii pa~NktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : RRitava stha.aRRitaavRRidha.aRRituShThaa stha.aRRitaavRRidhaH. ghRRitashchyuto madhushchyuto viraajo naama kaamadughaa.aakShiiyamaaNaaH .3 .
Component Words : RRitavaH. stha. RRitaavRRidhaH. RRitavRRidha ityRRita.avRRidhaH. RRituShThaaH. RRitusthaa ityRRitu.asthaaH. stha. RRitaavRRidhaH. RRitavRRidha ityRRita.avRRidhaH. ghRRitashchyuta iti ghRRita.ashchyutaH. madhushchyuta iti madhu.ashchyutaH. viraaja iti vi.araajaH. naama. kaamadughaa iti kaamadughaa. akShiiyamaaNaaH .3 .
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडार्षी पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : स्त्री लोग पति आदि के साथ कैसे वर्त्तें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदपाठ : ऋ॒तवः॑। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। ऋ॒तु॒ष्ठाः। ऋ॒तु॒स्था इत्यृ॑तु॒ऽस्थाः। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। घृ॒त॒श्च्युत॒ इति॑ घृत॒ऽश्च्युतः॑। म॒धु॒श्च्युत॒ इति॑ मधु॒ऽश्च्युतः॑। वि॒राज॒ इति॑ वि॒ऽराजः॑। नाम॑। का॒म॒दुघा॒ इति॑ काम॒दुघा॑। अक्षी॑यमाणाः॥३॥
पदार्थ : हे स्त्रियो! जो तुम लोग (ऋतवः) वसन्तादि ऋतुओं के समान (स्थ) हो तथा जो (ऋतावृधः) उदक से नदियों के तुल्य सत्य के साथ उन्नति को प्राप्त होने वा (ऋतुष्ठाः) वसन्तादि ऋतुओं में स्थित होने और (ऋतावृधः) सत्य को बढ़ाने वाली (स्थ) हो और जो तुम (घृतश्च्युतः) जिनसे घी निकले उन (मधुश्च्युतः) मधुर रस से प्राप्त हुई (अक्षीयमाणाः) रक्षा करने योग्य (विराजः) विविध प्रकार के गुणों से प्रकाशमान तथा (कामदुघाः) कामनाओं को पूरण करनेहारी (नाम) प्रसिद्ध गौओं के सदृश होवे, तुम लोग हम लोगों को सुखी करो॥३॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ऋतु और गौ अपने-अपने समय पर अनुकूलता से सब प्राणियों को सुखी करती हैं, वैसे ही अच्छी स्त्रियां सब समय में अपने पति आदि सब पुरुषों को तृप्त कर आनन्दित करें॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडार्षी पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : स्त्रियः पत्यादिभिः सह कथं वर्त्तेरन्नित्याह॥
पदपाठ : ऋ॒तवः॑। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। ऋ॒तु॒ष्ठाः। ऋ॒तु॒स्था इत्यृ॑तु॒ऽस्थाः। स्थ॒। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। घृ॒त॒श्च्युत॒ इति॑ घृत॒ऽश्च्युतः॑। म॒धु॒श्च्युत॒ इति॑ मधु॒ऽश्च्युतः॑। वि॒राज॒ इति॑ वि॒ऽराजः॑। नाम॑। का॒म॒दुघा॒ इति॑ काम॒दुघा॑। अक्षी॑यमाणाः॥३॥
पदार्थ : (ऋतवः) यथा वसन्तादयस्तथा (स्थ) भवत (ऋतावृधः) या ऋतेन जलेन नद्य इव सत्येन वर्द्धन्ते ताः। अत्र अन्येषामपि दृश्यते [अष्टा॰६.३.१३७] इति दीर्घः (ऋतुष्ठाः) या ऋतुषु वसन्तादिषु तिष्ठन्ति ताः (स्थ) भवत (ऋतावृधः) या ऋतं सत्यं वर्धयन्ति ताः (घृतश्च्युतः) घृतमाज्यं श्च्युतं निस्सृतं याभ्यस्ताः (मधुश्च्युतः) या मधुनो मधुरात् रसात् प्राप्ताः (विराजः) विविधैर्गुणै राजमानाः प्रकाशमानाः (नाम) प्रसिद्धाः (कामदुघाः) याः कामान् दुहन्ति प्रपिपुरति ताः (अक्षीयमाणाः) क्षेतुमनर्हाः॥३॥
अन्वय : हे स्त्रियः! या यूयं ऋतवः स्थ, या ऋतावृध ऋतुष्ठा ऋतावृधः स्थ, याश्च यूयं घृतश्च्युतो मधुश्च्युतोऽक्षीयमाणा विराजः कामदुघा नाम धेनव इव स्थ, ता अस्मान् सुखयत॥३॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा ऋतवो गावश्च स्वस्वसमयानुकूलतया सर्वान् प्राणिनः सुखयन्ति, तथैव सत्यस्त्रियः प्रतिसमयं स्वपत्यादीन् सर्वान् संतर्प्यानन्दयन्तु॥३॥