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Yajurveda / 17 / 30

तमिद् गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ऽआपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मग॑च्छन्त॒ विश्वे॑। अ॒जस्य॒ नाभा॒वध्येक॒मर्पि॑तं॒ यस्मि॒न् विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुः॥३०॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 17 | Mantra No : 30

In Hindi:

ऋषि : भुवनपुत्रो विश्वकर्मा | देवता : विश्वकर्मा | छन्द : आर्षी त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : तम्। इत्। गर्भ॑म्। प्र॒थ॒मम्। द॒ध्रे॒। आपः॑। यत्र॑। दे॒वाः। स॒मग॑च्छ॒न्तेति॑ सम्ऽअग॑च्छन्त। विश्वे॑। अ॒जस्य॑। नाभौ॑। अधि॑। एक॑म्। अर्पि॑तम्। यस्मि॑न्। विश्वा॑नि। भुव॑नानि। त॒स्थुः॥३०॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! (यत्र) जिस ब्रह्म में (आपः) कारणमात्र प्राण वा जीव (प्रथमम्) विस्तारयुक्त अनादि (गर्भम्) सब लोकों की उत्पत्ति का स्थान प्रकृति को (दध्रे) धारण करते हुए वा जिसमें (विश्वे) सब (देवाः) दिव्य आत्मा और अन्तःकरणयुक्त योगीजन (समगच्छन्त) प्राप्त होते हैं, वा जो (अजस्य) अनुत्पन्न अनादि जीव वा अव्यक्त कारणसमूह के (नाभौ) मध्य में (अधि) अधिष्ठातृपन से सब के ऊपर विराजमान (एकम्) आप ही सिद्ध (अर्पितम्) स्थित (यस्मिन्) जिस में (विश्वानि) समस्त (भुवनानि) लोकोत्पन्न द्रव्य (तस्थुः) स्थिर होते हैं, तुम लोग (तमित्) उसी को परमात्मा जानो॥३०॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि जो जगत् का आधार, योगियों को प्राप्त होने योग्य, अन्तर्यामी, आप अपना आधार, सब में व्याप्त है, उसी का सेवन सब लोग करें॥३०॥