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Yajurveda / 19 / 20

प॒शुभिः॑ प॒शूना॑प्नोति पुरो॒डाशै॑र्ह॒वीष्या। छन्दो॑भिः सामिधे॒नीर्या॒ज्या᳖भिर्वषट्का॒रान्॥२०॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 19 | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : हैमवर्चिः | देवता : यजमानः | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : प॒शुभि॒रिति॑ प॒शुभिः॑। प॒शून्। आ॒प्नो॒ति॒। पु॒रो॒डाशैः॑। ह॒वीषि॑। आ। छन्दो॑भि॒रिति॒ छन्दः॑ऽभिः। सा॒मि॒धे॒नीरिति॑ साम्ऽइधे॒नीः। या॒ज्या᳖भिः। व॒ष॒ट्क॒ारानिति॑ वषट्ऽका॒रान्॥२०॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! जैसे सद्गृहस्थ (पशुभिः) गवादि पशुओं से (पशून्) गवादि पशुओं को (पुरोडाशैः) पचन क्रियाओं से पके हुए उत्तम पदार्थों से (हवींषि) हवन करते योग्य उत्तम पदार्थों को (छन्दोभिः) गायत्री आदि छन्दों की विद्या से (सामिधेनीः) जिससे अग्नि प्रदीप्त हो, उस सुन्दर समिधाओं को (याज्याभिः) यज्ञ की क्रियाओं से (वषट्कारान्) जो धर्मयुक्त क्रिया को करते हैं, उनको (आ, आप्नोति) प्राप्त होता है, वैसे इनको तुम भी प्राप्त होओ॥२०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो संसार में बहुत पशु वाला होम करके, हुतशेष का भोक्ता, वेदवित् और सत्यक्रिया का कर्त्ता मनुष्य होवे, सो प्रशंसा को प्राप्त होता है॥२०॥