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Yajurveda / 20 / 6

जि॒ह्वा मे॑ भ॒द्रं वाङ् महो॒ मनो॑ म॒न्युः स्व॒राड् भामः॑। मोदाः॑ प्रमो॒दा अ॒ङ्गुली॒रङ्गा॑नि मि॒त्रं मे॒ सहः॑॥६॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 20 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिः | देवता : सभापतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : जि॒ह्वा। मे॒। भ॒द्रम्। वाक्। महः॑। मनः॑। म॒न्युः। स्व॒राडिति॑ स्व॒ऽराट्। भामः॑। मोदाः॑। प्र॒मो॒दा इति॑ प्रऽमो॒दाः। अ॒ङ्गुलीः॑। अङ्गा॑नि। मि॒त्रम्। मे॒। सहः॑॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! (मे) मेरी (जिह्वा) जीभ (भद्रम्) कल्याणकारक अन्नादि के भोग करनेहारी (वाक्) जिससे बोला जाता है, वह वाणी (महः) बड़ी पूजनीय वेदशास्त्र के बोध से युक्त (मनः) विचार करने वाला अन्तःकरण (मन्युः) दुष्टाचारी मनुष्यों पर क्रोध करनेहारा (स्वराट्) स्वयं प्रकाशमान बुद्धि (भामः) जिससे प्रकाश होता है (मोदाः) हर्ष, उत्साह (प्रमोदाः) प्रकृष्ट आनन्द के योग (अङ्गुलीः) अङ्गुलियां (अङ्गानि) और अन्य सब अङ्ग (मित्रम्) सखा और (सहः) सहन (मे) मेरे सहायक हों॥६॥

भावार्थ : जो राजपुरुष ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रियता और धर्माचरण से पथ्य आहार करने, सत्य वाणी बोलने, दुष्टों में क्रोध का प्रकाश करनेहारे, आनन्दित हो अन्यों को आनन्दित करते हुए, पुरुषार्थी, सब के मित्र और बलिष्ठ होवें, वे सर्वदा सुखी रहें॥६॥