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Yajurveda / 20 / 20

द्रु॒प॒दादि॑व मुमुचा॒नः स्वि॒न्नः स्ना॒तो मला॑दिव। पू॒तं प॒वित्रे॑णे॒वाज्य॒मापः॑ शुन्धन्तु॒ मैन॑सः॥२०॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 20 | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिः | देवता : आपः | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : द्रु॒प॒दादि॒वेति॑ द्रुप॒दात्ऽइ॑व। मु॒मु॒चा॒नः। स्वि॒न्नः। स्ना॒तः। मला॑दि॒वेति॒ मला॑त्ऽइव। पू॒तम्। प॒वित्रे॑णे॒वेति॑ प॒वित्रे॑णऽइव। आज्य॑म्। आपः॑। शु॒न्ध॒न्तु॒। मा॒। एन॑सः॥२०॥

पदार्थ : हे (आपः) प्राण वा जलों के समान निर्मल विद्वान् लोगो! आप (द्रुपदादिव, मुमचानः) वृक्ष से जैसे फल, रस, पुष्प, पत्ता आदि अलग होते वा जैसे (स्विन्नः) स्वेदयुक्त मनुष्य (स्नातः) स्नान करके (मलादिव) मल से छूटता है, वैसे वा (पवित्रेणेव) जैसे पवित्र करने वाले पदार्थ से (पूतम्) शुद्ध (आज्यम्) घृत होता है, वैसे (मा) मुझ को (एनसः) अपराध से पृथक् करके (शुन्धन्तु) शुद्ध करें॥२०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। अध्यापक उपदेशक लोगों को योग्य है कि इस प्रकार सब को अच्छी शिक्षा से युक्त करें, जिससे वे शुद्ध आत्मा, नीरोग शरीर और धर्मयुक्त कर्म करने वाले हों॥२०॥