Yajurveda / 21 / 21
श॒मि॒ता नो॒ वन॒स्पतिः॑ सवि॒ता प्र॑सु॒वन् भग॑म्।क॒कुप् छन्द॑ऽइ॒हेन्द्रि॒यं व॒शा वे॒हद्वयो॑ दधुः॥२१॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 21 | Mantra No : 21
Seer : svastyaatreyaH | Devta : vishvedevaaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : shamitaa no vanaspatiH savitaa prasuvan bhagam. kakup Chanda.aihendriya.m vashaa vehadvayo dadhuH .21 .
Component Words : shamitaa. naH. vanaspatiH. savitaa. prasuvanniti pra.asuvan. bhagam. kakup. ChandaH. iha. indriyam. vashaa. vehat. vayaH. dadhuH .21 .
In Hindi:
ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर प्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं॥
पदपाठ : श॒मि॒ता। नः॒। वन॒स्पतिः॑। स॒वि॒ता। प्र॒सु॒वन्निति॑ प्रऽसु॒वन्। भग॑म्। क॒कुप्। छन्दः॑। इ॒ह। इ॒न्द्रि॒यम्। व॒शा। वे॒हत्। वयः॑। द॒धुः॒॥२१॥
पदार्थ : हे मनुष्यो! जो (शमिता) शान्ति देने हारा (वनस्पतिः) औषधियों का राजा वा वृक्षों का पालक (सविता) सूर्य (भगम्) धन को (प्रसुवन्) उत्पन्न करता हुआ (ककुप्) ककुप् (छन्दः) छन्द और (इन्द्रियम्) जीव के चिह्न को तथा (वशा) जिस के सन्तान नहीं हुआ और (वेहत्) जो गर्भ को गिराती है, वह (इह) इस जगत् में (नः) हमारे (वयः) प्राप्त होने योग्य वस्तु को (दधुः) धारण करे, उस को तुम लोग जान के उपकार करो॥२१॥
भावार्थ : जिस मनुष्य से सर्वरोग की नाशक औषधियां और ढांकने वाले उत्तम वस्त्र सेवन किये जाते हैं, वह बहुत वर्षों तक जी सकता है॥२१॥
In Sanskrit:
ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनः प्रजाविषयमाह॥
पदपाठ : श॒मि॒ता। नः॒। वन॒स्पतिः॑। स॒वि॒ता। प्र॒सु॒वन्निति॑ प्रऽसु॒वन्। भग॑म्। क॒कुप्। छन्दः॑। इ॒ह। इ॒न्द्रि॒यम्। व॒शा। वे॒हत्। वयः॑। द॒धुः॒॥२१॥
पदार्थ : (शमिता) शान्तिप्रदः (नः) अस्माकम् (वनस्पतिः) ओषधिराजो वृक्षाणां पालकश्च (सविता) सूर्यः (प्रसुवन्) उत्पादयन् (भगम्) धनम् (ककुप्) (छन्दः) (इह) संसारे (इन्द्रियम्) जीवलिङ्गम् (वशा) अप्रसूता (वेहत्) या प्रसवं विहन्ति सा (वयः) व्याप्तव्यम् (दधुः)॥२१॥
अन्वय : हे मनुष्याः! यः शमिता वनस्पतिः सविता भगं प्रसुवन् ककुप् छन्द इन्द्रियं वशा वेहच्चेह नो वयो दधुस्तान् यूयं विज्ञायोपकुरुत॥२१॥
भावार्थ : येन मनुष्येण सर्वरोगप्रणाशिका औषधय आवरकाण्युत्तमानि वस्त्राणि च सेव्यन्ते, स चिरंजीवी भवति॥२१॥