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Yajurveda / 22 / 9

तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥९॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 22 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रः | देवता : सविता | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब ईश्वर के विषय में अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : तत्। स॒वि॒तुः। वरे॑ण्यम्। भर्गः॑। दे॒वस्य॑। धी॒म॒हि॒। धियः॑। यः। नः॒। प्र॒चो॒दया॒दिति॑ प्रऽचो॒दया॑त्॥९॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! (सवितुः) समस्त संसार उत्पन्न करने हारे (देवस्य) आप से आप ही प्रकाशरूप सब के चाहने योग्य समस्त सुखों के देने हारे परमेश्वर के जिस (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य अति उत्तम (भर्गः) समस्त दोषों के दाह करने वाले तेजोमय शुद्धस्वरूप को हम लोग (धीमहि) धारण करते हैं, (तत्) उसको तुम लोग धारण करो (यः) जो (नः) हम सब लोगों की (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) प्रेरे अर्थात् उनको अच्छे-अच्छे कामों में लगावे, वह अन्तर्यामी परमात्मा सबके उपासना करने के योग्य है॥९॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिये कि सच्चिदानन्दस्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, सब के अन्तर्यामी परमात्मा को छोड़के उसकी जगह में अन्य किसी पदार्थ की उपासना का स्थापन कभी न करें। किस प्रयोजन के लिये कि जो हम लोगों से उपासना किया हुआ परमात्मा हमारी बुद्धियों को अधर्म के आचरण से छुड़ाके धर्म के आचरण में प्रवृत्त करे, जिससे शुद्ध हुए हम लोग उस परमात्मा को प्राप्त होकर इस लोक और परलोक के सुखों को भोगें इस प्रयोजन के लिये॥९॥