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Yajurveda / 25 / 25

यन्नि॒र्णिजा॒ रेक्ण॑सा॒ प्रावृ॑तस्य रा॒तिं गृ॑भी॒तां मु॑ख॒तो नय॑न्ति।सुप्रा॑ङ॒जो मेम्य॑द्वि॒श्वरू॑पऽइन्द्रापू॒ष्णोः प्रि॒यमप्ये॑ति॒ पाथः॑॥२५॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 25 | Mantra No : 25

In Hindi:

ऋषि : गोतमः | देवता : विद्वांसः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : यत्। नि॒र्णिजा॑। नि॒र्निजेति॑ निः॒ऽनिजा॑। रेक्ण॑सा। प्रावृ॑तस्य। रा॒तिम्। गृ॒भी॒ताम्। मु॒ख॒तः। नय॑न्ति। सुप्रा॒ङिति॒। सुऽप्रा॑ङ्। अ॒जः। मेम्य॑त्। वि॒श्वरू॑प॒ इति॑ विश्वरू॑पः। इ॒न्द्रा॒पू॒ष्णोः। प्रि॒यम्। अपि॑। ए॒ति। पाथः॑॥२५॥

पदार्थ : (यत्) जो मनुष्य (निर्णिजा) सुन्दररूप और (रेक्णसा) धन से (प्रावृतस्य) युक्त जन की (रातिम्) देनी वा (गृभीताम्) ली हुई वस्तु को (मुखतः) आगे से (नयन्ति) प्राप्त कराते तथा जो (मेम्यत्) प्राप्त होता हुआ (सुप्राङ्) अच्छे प्रकार पूछने वाला (विश्वरूपः) संसार जिस का रूप वह (अजः) जन्म और मरण आदि दोषों से रहित अविनाशी जीव (इन्द्रापूष्णोः) बिजुली और पवन सम्बन्धी (प्रियम्) मनोहर (पाथः) अन्न को (अप्येति) सब ओर से पाता है, वे मनुष्य और वह जीव सब आनन्द को प्राप्त होते हैं॥२५॥

भावार्थ : जो मनुष्य धन को पाकर अच्छे कामों में खर्च करते हैं, वे सब कामनाओं को पाते हैं॥२५॥