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Yajurveda / 29 / 29

प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यते॒ऽअग्रे॒ऽअह्ना॑म्।व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ऽअदि॑तये स्यो॒नम्॥२९॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 29 | Mantra No : 29

In Hindi:

ऋषि : जमदग्निः | देवता : अन्तरिक्षम् | छन्द : भुरिक् पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : प्रा॒चीन॑म्। ब॒र्हिः। प्र॒दिशेति॑ प्र॒ऽदिशा॑। पृ॒थि॒व्याः। वस्तोः॑। अ॒स्याः। वृ॒ज्य॒ते॒। अग्रे॑। अह्ना॑म्। वि। ऊँ॒ इ॑त्यूँ। प्र॒थ॒ते॒। वि॒त॒रमिति॑ विऽत॒रम्। वरी॑यः। दे॒वेभ्यः॑। अदि॑तये। स्यो॒नम्॥२९॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! जो (अस्याः) इस (पृथिव्याः) भूमि के बीच (प्राचीनम्) सनातन (बर्हिः) अन्तरिक्ष के तुल्य व्यापक ब्रह्म (वस्तोः) दिन के प्रकाश से (वृज्यते) अलग होता (अह्नाम्) दिनों के (अग्रे) आरम्भ प्रातःकाल में (देवेभ्यः) विद्वानों (उ) और (अदितये) अविनाशी आत्मा के लिए (वितरम्) विशेषकर दुःखों से पार करनेहारे (वरीयः) अतिश्रेष्ठ (स्योनम्) सुख को (वि, प्रथते) विशेषकर प्रकट करता उसको तुम लोग (प्रदिशा) वेद शास्त्र के निर्देश से जानो और प्राप्त होओ॥२९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों के लिए सुख देवें, वे सर्वोत्तम सुख को प्राप्त हों, जैसे आकाश सब दिशाओं और पृथिव्यादि में व्याप्त है, वैसे जगदीश्वर सर्वत्र व्याप्त है। जो लोग ऐसे ईश्वर की प्रातःकाल उपासना करते वे धर्मात्मा हुए विस्तीर्ण सुखों वाले होते हैं॥२९॥