Yajurveda / 39 / 10
लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॒ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ त्व॒चे स्वाहा॑ त्व॒चे स्वाहा॒ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॒ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॒ मेदो॑भ्यः॒ स्वाहा॒ मेदो॑भ्यः॒ स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॒ स्वाहा॑ मा॒सेभ्यः॒ स्वाहा॒ स्नाव॑भ्यः॒ स्वाहा॒ स्नाव॑भ्यः॒ स्वाहा॒ऽस्थभ्यः॒ स्वाहाऽ॒स्थभ्यः॒ स्वाहा॑ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑। रेत॑से॒ स्वाहा॑ पा॒यवे॒ स्वाहा॑॥१०॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 39 | Mantra No : 10
Seer : diirghatamaa | Devta : agniH | Metre : aakRRitiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : lomabhyaH svaahaa lomabhyaH svaahaa tvache svaahaa tvache svaahaa lohitaaya svaahaa lohitaaya svaahaa medobhyaH svaahaa medobhyaH svaahaa. maa.nsebhyaH svaahaa maa.nsebhyaH svaahaa snaavabhyaH svaahaa snaavabhyaH svaahaa.asthabhyaH svaahaa.asthabhyaH svaahaa majjabhyaH svaahaa majjabhyaH svaahaa. retase svaahaa paayave svaahaa .10 .
Component Words : lomabhya iti loma.abhyaH. svaahaa. lomabhya iti loma.abhyaH. svaahaa. tvache. svaahaa. tvache. svaahaa. lohitaaya. svaahaa. lohitaaya. svaahaa. medobhya iti medaH.abhyaH. svaahaa. medobhya iti medaH.abhyaH. svaahaa. maa.nsebhyaH. svaahaa. maa.nsebhyaH. svaahaa. snaavabhya iti snaava.abhyaH. svaahaa. snaavabhya iti snaava.abhyaH. svaahaa. asthabhya ityastha.abhyaH. svaahaa. asthabhya ityastha.abhyaH. svaahaa. majjabhya iti majja.abhyaH. svaahaa. majjabhya iti majja.abhyaH. svaahaa. retase. svaahaa. paayave. svaahaa .10 .
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा | देवता : अग्निः | छन्द : आकृतिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : मनुष्यों को भस्म होने तक शरीर का मन्त्रों से दाह करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदपाठ : लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। रेत॑से॑। स्वाहा॑। पा॒यवे॑। स्वाहा॑॥१०॥
पदार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि दाहकर्म में घी आदि से (लोमभ्यः) त्वचा के ऊपरले वालों के लिये (स्वाहा) इस शब्द का (लोमभ्यः) नख आदि के लिये (स्वाहा) (त्वचे) शरीर की त्वचा जलाने को (स्वाहा) (त्वचे) भीतरली त्वचा जलाने के लिये (स्वाहा) (लोहिताय) रुधिर जलाने को (स्वाहा) (लोहिताय) हृदयस्थ रुधिर पिण्ड जलाने को (स्वाहा) (मेदोभ्यः) चिकने धातुओं के जलाने को (स्वाहा) (मेदोभ्यः) सब शरीर के अवयवों को आर्द्र करनेवाले भागों के जलाने को (स्वाहा) (मांसेभ्यः) बाहरले मांसों के जलाने को (स्वाहा) (मांसेभ्यः) भीतरले मांसों के जलाने के लिये (स्वाहा) (स्नावभ्यः) स्थूल नाडि़यो के जलाने को (स्वाहा) (स्नावभ्यः) सूक्ष्म नाडि़यों के जलाने को (स्वाहा) (अस्थभ्यः) शरीरस्थ कठिन अवयवों के जलाने के लिये (स्वाहा) (अस्थभ्यः) सूक्ष्म अस्थिरूप अवयवों के जलाने को (स्वाहा) (मज्जभ्यः) हाड़ों के भीतर के धातुओं के लिये (स्वाहा) (मज्जभ्यः) उसके अन्तर्गत भाग के जलाने को (स्वाहा) (रेतसे) वीर्य के जलाने को (स्वाहा) और (पायवे) गुदारूप अवयव के दाह के लिये (स्वाहा) इस शब्द का निरन्तर प्रयोग करें॥१०॥
भावार्थ : हे मनुष्यो! जब तक लोम से लेकर वीर्य्य पर्यन्त उस मृत शरीर का भस्म न हो, तब तक घी और र्इंधन डाला करो॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा | देवता : अग्निः | छन्द : आकृतिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : मनुष्यैर्भस्मान्तं शरीरं मन्त्रैर्दाह्यमित्याह॥
पदपाठ : लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। रेत॑से॑। स्वाहा॑। पा॒यवे॑। स्वाहा॑॥१०॥
पदार्थ : (लोमभ्यः) त्वगुपरिस्थेभ्यो बालेभ्यः (स्वाहा) (लोमभ्यः) नखादिभ्यः (स्वाहा) (त्वचे) शरीरावरणदाहाय (स्वाहा) (त्वचे) तदन्तरावरणदाहाय (स्वाहा) (लोहिताय) रक्ताय (स्वाहा) (लोहिताय) हृदयस्थाय लोहितपिण्डाय (स्वाहा) (मेदोभ्यः) स्निग्धेभ्यो धातुविशेषेभ्यः (स्वाहा) (मेदोभ्यः) सर्वशरीरावयवार्द्रीकरेभ्यः (स्वाहा) (मांसेभ्यः) बहिःस्थेभ्यः (स्वाहा) (मांसेभ्यः) शरीरान्तर्गतेभ्यः (स्वाहा) (स्नावभ्यः) स्थूलनाडीभ्यः (स्वाहा) (स्नावभ्यः) सूक्ष्माभ्यः सिराभ्यः (स्वाहा) (अस्थभ्यः) शरीरस्थकठिनावयवेभ्यः (स्वाहा) (अस्थभ्यः) सूक्ष्मावयवाऽस्थिरूपेभ्यः (स्वाहा) (मज्जभ्यः) अस्थ्यन्तर्गतेभ्यो धातुभ्यः (स्वाहा) (मज्जभ्यः) तदन्तर्गतेभ्यः (स्वाहा) (रेतसे) वीर्य्याय (स्वाहा) (पायवे) गुह्यावयवदाहाय (स्वाहा)॥१०॥
अन्वय : मनुष्यैः प्रेतक्रियायां घृतादेर्लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मांसेभ्यः स्वाहा मांसेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहाऽस्थभ्यः स्वाहाऽस्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा सततं प्रयोज्या॥१०॥
भावार्थ : हे मनुष्याः! यावल्लोमान्यारभ्य वीर्यपर्यन्तस्य तच्छरीरस्य भस्म न स्यात् तावद् घृतेन्धनानि प्रक्षिपत॥१०॥