Atharvaveda / 1 / 11 / 4
नेव॑ मां॒से न पीव॑सि॒ नेव॑ म॒ज्जस्वाह॑तम्। अवै॑तु॒ पृश्नि॒ शेव॑लं॒ शुने॑ ज॒राय्वत्त॒वेऽव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : atharvaa | Devta : puuShaadayo mantroktaaH | Metre : pathyaapa~NktiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : neva maa.mse na piivasi neva majjasvaahatam. avaitu pRRishni shevala.m shune jaraayvattave.ava jaraayu padyataam . 4.
Component Words : na.aiva . maa.mse . na . piibasi . na.aiva . majja.asu . aa.ahatam . ava . etu . pRRishni . shevalam . shune . jaraayu . attave . ava . jaraayu . padyataam .
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : पूषादयो मन्त्रोक्ताः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :
विषय : सृष्टिविद्या का वर्णन।
पदपाठ : नऽइ॑व । मां॒से । न । पीब॑सि । नऽइ॑व । म॒ज्जऽसु॑ । आऽह॑तम् । अव॑ । ए॒तु॒ । पृश्नि॑ । शेव॑लम् । शुने॑ । ज॒रायु॑ । अत्त॑वे । अव॑ । ज॒रायु॑ । प॒द्य॒ता॒म् ॥
पदार्थ : [वह जरायु] (नेव) न तो (मांसे) मांस में (न) न (पीवसि) शरीर की मुटाई में (नेव) और न (मज्जसु) हड्डियों की मीग में (आहतम्) बँधी हुयी हैं। (पृश्नि) पतली (शेवलम्) सेवार घास के समान (जरायु) जेली वा झिल्ली (शुने) कुत्ते के लिये (अत्तवे) खाने को (अव) नीचे (एतु) आवे, (जरायु) जरायु (अव) नीचे (पद्यताम्) गिर जावे ॥४॥"
भावार्थ : जरायु एक झिल्ली होती है, जिसे जेली वा जेरी कहते हैं और जिस में बालक गर्भ के भीतर लिपटा रहता है, कुछ उसमें से बालक के साथ निकल आती है और कुछ पीछे। यह जरायु बालक उत्पन्न होने पर नाभि आदि के बन्धन से छुट जाती है और साररहित होकर माता के उदर में ऐसे फिरता है, जैसे सेवार नाम घास जलाशय में। शरीर में उसके रह जाने से रोग हो जाता है। इससे उस जरायु का उदर से निकल जाना आवश्यक है, जिससे प्रसूता नीरोग होकर सुखी रहे ॥४॥
टिप्पणी :४−न-इव। इव अवधाने। नैव। मांसे। मनेर्दीर्घश्च। उ० ३।६४। इति मन ज्ञाने धृतौ च सप्रत्ययः, दीर्घश्च। रक्तजधातुविशेषे। न। निषेधे। पीवसि। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति पीव स्थौल्ये-असुन्। ञ्नित्यादिर्नित्यम्। पा० ६।१।१९७। इति नित्त्वाद् आद्युदात्तः। स्थूलत्वे। मज्जसु। श्वनुक्षन्पूषन्०। उ० १।१५९। इति मस्ज जलान्तःप्रवेशे-कनिन्, निपात्यते च। अस्थिमध्यस्थस्नेहेषु। आ-हतम्। आङ्+हन वधे गतौ च-क्त। संबद्धम्। अव। अवाक्, अधस्तात्। एतु। गच्छतु पततु। पृश्नि। घृणि−पृश्नीति। उ० ४।५२। इति स्पृश स्पर्शे-नि, सलोपः। स्वल्पम्। शेवलम्। शीङो धुक्लक्वलञ्वालनः। उ० ४।३८। इति शीङ् शयने-वालन्, ह्रस्वो वा। नित्त्वाद् आद्युदात्तः। जलस्योपरिस्थतृणविशेषः, शेवालं शैवलं वा। तद्वत् जननीजठरे स्थितं जरायु। शुने। श्वनुक्षन्पूषन्। उ० १।१५९। इति श्वि गतौ-कनिन्। कुक्कुराय। जरायु। किंजरयोः श्रिणः। उ० १।४। इति जरा+इण् गतौ-ञुण्। गर्भवेष्टनचर्म। उल्वम्। मांसपिण्डश्च यः प्रजननानन्तरं निःसरति। अत्तवे। तुमर्थे सेसेन्०। पा० ३।४।९। इति अद भक्षणे−तवेन् प्रत्ययः। भक्षितुम्। पद्यताम्। पद गतौ दिवादित्वात् श्यन्। नित्यवीप्सयोः। पा० ८।१।४। इति नित्यतायां पुनः कथनम् गच्छतु, पततु ॥