Atharvaveda / 1 / 24 / 4
श्या॒मा स॑रूपं॒कर॑णी पृथि॒व्या अध्युद्भृ॑ता। इ॒दमू॑ षु॒ प्र सा॑धय॒ पुना॑ रू॒पाणि॑ कल्पय ॥4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : brahmaa | Devta : aasurii vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : shyaamaa saruupa.mkaraNii pRRithivyaa adhyudbhRRitaa. idamuu Shu pra saadhaya punaa ruupaaNi kalpaya .4.
Component Words : shyaamaa . saruupam.akaraNii . pRRithivyaaH . adhi . ut.abhRRitaa. idam . uu.m iti . su . pra . saadhaya . punaH . ruupaaNi . kalpaya .
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आसुरी वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : महारोग के नाश के लिये उपदेश।
पदपाठ : श्या॒मा । स॒रू॒प॒म्ऽकर॑णी । पृ॒थि॒व्या: । अधि॑ । उत्ऽभृ॑ता। इ॒दम् । ऊं॒ इति॑ । सु । प्र । सा॒ध॒य॒ । पुन॑: । रू॒पाणि॑ । क॒ल्प॒य॒ ॥
पदार्थ : (श्यामा) व्यापनशीला वा सुखप्रदा, (सरूपं करणी) सुन्दरता करनेहारी तू (पृथिव्याः अधि) विख्यात वा विस्तीर्ण पृथिवी में से (उद्भृता) उखाड़ी गई है। (इदम् उ) इस [कर्म्म] को (सु) भली-भाँति से (प्रसाधय) सिद्ध कर, (पुनः) और (रूपाणि) [इस पुरुष] की सुन्दरताओं को (कल्पय) पूर्ण कर ॥४॥"
भावार्थ : जैसे उत्तम वैद्य उत्तम औषधों से रोग को निवृत्त कर रोगी को सर्वाङ्ग पुष्ट करके आनन्दयुक्त करते हैं, इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुष सब विघ्नों को हटा कर कार्य्यसिद्धि कर आनन्द भोगते हैं ॥४॥ मुद्राराक्षस में कहा है−“धरि लात विघ्न अनेक पैं निरभय न उद्यम तें टरैं। जे पुरुष उत्तम अन्त में ते सिद्ध सब कारज करैं ॥”
टिप्पणी :४−श्यामा। इषियुधीन्धिदसिश्याधूसूभ्यो मक्। उ० १।१४५। इति श्यैङ् गतौ-मक्, टाप्। श्यायति गच्छति सुखं प्राप्नोति सा श्यामा व्यापनशीला। सुखप्रदा। ओषधिः। सरूपम्-करणी। सरूपं क्रियते अनयेति। करणाधिकरणयोश्च। पा० ३।३।११७। इति कृञः करणे ल्युट्। पूर्वपदे सुपो लुगभावश्छान्दसः। टिड्ढाणञ्द्वयसज्०। पा० ४।१।१५। इति ङीप्। सुन्दररूपकर्त्री। पृथिव्याः। १।२।१। प्रख्याताया विस्तीर्णाया वा भूमेः सकाशात्। अधि। पञ्चम्यर्थानुवादी। उत्-भृता। उत्+भृञ्-क्त। उत्खाता। उत्पादिता। ऊँ इति। पादपूरणः। पदपूरणस्ते मिताक्षरेष्वनर्थकाः, कमीमिद्विति। निरु० १।९। प्र+साधय। प्र+षाध सिद्धौ, णिच्। सिद्धं कुरु, प्रवर्धय। पुनः। अनन्तरम्। पुना रूपाणि। रो रि। पा० ८।३।१४। इति रेफस्य लोपे कृते। ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः। पा० ६।३।१११। इति पूर्वदीर्घः। रूपाणि। सौन्दर्याणि, स्वास्थ्यलक्षणानि। कल्पय। कृपू सामर्थ्ये, णिच्, कृपो रो लः। पा० ८।२।१८। इति लत्वम्। संपादय, पूरय ॥