Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 1 / 26 / 3

यू॒यं नः॑ प्रवतो नपा॒न्मरु॑तः॒ सूर्य॑त्वचसः। शर्म॑ यच्छाथ स॒प्रथः॑ ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : मरुद्गणः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : युद्ध का प्रकरण।

पदपाठ : यू॒यम् । न॒: । प्र॒ऽव॒त॒: । न॒पा॒त् । मरु॑त: । सूर्य॑ऽत्वचस: । शर्म॑ । य॒च्छा॒थ॒ । स॒ऽमथा॑: ॥

पदार्थ : (प्रवतः) हे [अपने] भक्त के (नपात्) न गिरानेहारे राजन् ! और (सूर्यत्वचसः) हे सूर्यसमान प्रतापवाले (मरुतः) शत्रुओं के मारनेहारे शूरवीर महात्माओ ! (यूयम्) तुम सब (नः) हमारे लिये (सप्रथः) बहुत विस्तीर्ण (शर्म) सुख वा शरण (यच्छाथ) दान करो ॥३॥"

भावार्थ : अपने भक्तों की रक्षा करनेहारा राजा और महाप्रतापी धर्म-धुरंधर शूरवीर मन्त्री आदि मिल कर प्रजा की सर्वथा रक्षा करके अपने शरण में रक्खें ॥३॥

टिप्पणी :टिप्पणी−अजमेर वैदिक यन्त्रालय और बंबई गवर्नमेन्ट के पुस्तक के संहितापाठ में (सप्रथाः) पाठ अशुद्ध दीखता है, सायणभाष्य और बंबई के सेवकलाल कृष्णदास-शोधित पुस्तक का (सप्रथः) पाठ शुद्ध जान कर हमने यहाँ पर लिया है ॥ ३−यूयम्। प्रवतो नपात् मरुतश्च। प्र-वतः। १।१३।२। भक्तस्य, सेवकस्य। भक्तान्। द्वितीयायां बहुवचनं वा। नपात्। १।१३।२। न पातयतीति। हे अपातनशील राजन् ! मरुतः। १।२०।१। मारयन्ति शत्रून् ते। हे शूरवीराः पुरुषाः। सूर्य-त्वचसः। त्वच संवरणे−असुन्। सूर्यस्य त्वक् संवरणमिव संवरणं येषां ते। सूर्यसमानतेजस्काः। शर्म। १।२०।३। सुखम्, शरणम्। यच्छाथ। दाण् दाने−लेट्। प्रयच्छत, दत्त। स-प्रथः। सह+प्रथ ख्यातौ असुन्। प्रथसा सहितं, सविस्तारम् ॥