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Atharvaveda / 1 / 28 / 3

या श॒शाप॒ शप॑नेन॒ याघं मूर॑माद॒धे। या रस॑स्य॒ हर॑णाय जा॒तमा॑रे॒भे तो॒कम॑त्तु॒ सा ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 28 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : चातनः | देवता : यातुधानी | छन्द : विराट्पथ्याबृहती | स्वर :

विषय : युद्ध का प्रकरण।

पदपाठ : या । श॒शाप॑ । शप॑नेन । या । अ॒घम् । मूर॑म् । आ॒ऽद॒धे । या । रस॑स्य । हर॑णाय । जा॒तम् । आ॒ऽरे॒भे । तो॒कम् । अ॒त्तु॒ । सा ॥

पदार्थ : (या) जिस [शत्रुसेना] ने (शपनेन) शाप [कुवचन] से (शशाप) कोसा है और (या) जिसने (अघम्) दुःख की (मूरम्) मूल को (आदधे) आकर जमाया है और (या) जिसने (रसस्य) रस के (हरणाय) हरण के लिये (जातम्) [हमारे] समूह को (आरेभे) हाथ लगाया है, (सा) वह [शत्रुसेना] (तोकम्) अपनी बढ़ती वा सन्तान को (अत्तु) खा लेवे ॥३॥"

भावार्थ : रणक्षेत्र में जब शत्रुसेना कोलाहल मचाती, धावा मारती और लूट-खसोट करती आगे बढ़ती आवे, तो युद्धकुशल सेनापति शत्रुओं में भेद डाल दे कि वह लोग आपस में लड़ मरैं और अपने सन्तान अर्थात् हितकारियों का ही नाश कर दें ॥३॥ सायणभाष्य में (आदधे) के स्थान में [आददे] पाठ है ॥

टिप्पणी :३−या। यातुधानी शत्रुसेना। शशाप। शप आक्रोशे−लिट्। शापम्। अनिष्टकथनं कृतवती। शपनेन। शप आक्रोशे−करणे ल्युट्। आक्रोशेन, कुवचनेन। अघम्। अघ पापकरणे−णिच्−अच्। पापं दुःखम्। दुःख-करम्। मूरम्। क्विप् च। पा० ३।२।७६। इति मुर्छा मोहसमुच्छ्राययोः−क्विप्। राल्लोपः। पा० ६।४।२१। इति छकारलोपः। मूर्छाकरम्। यद्वा। मूल, प्रतिष्ठायाम्, रोपणे-कु, लस्य रकारः। मूलम्। प्रतिष्ठाम्। अघं मूरम्। दुःखकरं मूलं शरणम्। आ-दधे। आङ्+डुधाञ् धारणपोषणयोः, दाने च−लिट्। परि जग्राह। रसस्य। रस आस्वादे−पचाद्यच्। सारस्य, बलस्य, धनस्य, आनन्दस्य। हरणाय। अपहरणाय, नाशनाय। जातम्। जनी प्रादुर्भावे−क्त। अस्माकं समूहम्। आ-रेभे। आङ् पूर्वात् लभ आलम्भे=स्पर्शे-लिट्, लस्य रकारः। आलेभे, स्पृष्टवती। तोकम्। १।१३।२। वृद्धिकरम्। सन्तानम्। अत्तु। अक्षयतु नाशयतु। सा। शत्रुसेना।