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Atharvaveda / 1 / 29 / 3

अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृधत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॑भीव॒र्तो यथास॑सि ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 29 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अभीवर्तमणिः, ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।

पदपाठ : अ॒भि । त्वा॒ । दे॒व: । स॒वि॒ता । अ॒भि । सोम॑: । अ॒वी॒वृ॒ध॒त् । अ॒भि । त्वा॒ । विश्वा॑ । भू॒तानि॑ । अ॒भि॒ऽव॒र्त: । यथा॑ । अस॑सि ॥

पदार्थ : [हे परमेश्वर !] (देवः) प्रकाशमय (सविता) लोकों के चलानेहारे, सूर्य्य और (सोमः) अमृत देनेवाले, चन्द्रमा ने (त्वा) तेरी (अभि अभि) सब प्रकार से (अवीवृधत्) बड़ाई की है। और (विश्वा) सब (भूतानि) सृष्टि के पदार्थों ने (त्वा) तेरी (अभि) सब प्रकार [बड़ाई की है,] (यथा) क्योंकि तू (अभिवर्तः) [शत्रुओं का] दबानेवाला (अससि) है ॥३॥"

भावार्थ : सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल पदार्थों की रचना और उपकार से उस परमेश्वर की महिमा दीख पड़ती है, उसी अन्तर्यामी के दिये हुए आत्मबल से शूरवीर पुरुष रणभूमि में राक्षसों को जीत कर राज्य में शान्ति फैलाते हैं ॥३॥

टिप्पणी :३−अभि। अभितः सर्वतः। त्वा। त्वाम् ब्रह्मणस्पतिम्। देवः। प्रकाशमयः। सविता। १।१८।२। सूर्यः। सोमः। १।६।२। सवति अमृतम्। चन्द्रः। अवीवृधत्। वृधु वृद्धौ, णिच्−लुङ्। वर्धितवान्, अस्तावीत् अभि=अभि अवीवृधन् अस्तुवन्। विश्वा। शेर्लुक्। विश्वानि सर्वाणि। भूतानि। प्राणिजातानि, चराचरात्मकानि वस्तूनि, तत्त्वानि। अभिवर्तः-। म० १। वृतु-घञ्। अभिभविता, शत्रुजेता। यथा। यस्मात् कारणात्। अससि। अस भुवि−लट्। बहुलं छन्दसि। पा० २।४।७३। इति शपोऽलुक्। असि भवसि ॥