Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 1 / 32 / 3

यद्रोद॑सी॒ रेज॑माने॒ भूमि॑श्च नि॒रत॑क्षतम्। आ॒र्द्रं तद॒द्य स॑र्व॒दा स॑मु॒द्रस्ये॑व स्रो॒त्याः ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 32 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : द्यावापृथिवी | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्मविचार का उपदेश।

पदपाठ : यत् । रोद॑सी॒ इति॑ । रेज॑माने॒ इति॑ । भूमि॑: । च॒ । नि॒:ऽअत॑क्षतम् । आ॒र्द्रम् । तत् । अ॒द्य । स॒र्व॒दा । स॒मु॒द्रस्य॑ऽइव । स्रो॒त्या: ॥

पदार्थ : (रोदसी=सि) हे सूर्य (च) और (भूमिः) भूमि। (रेजमाने) काँपते हुए तुम दोनों ने (यत्) जिस [रस] को (निरतक्षम्) उत्पन्न किया है, (तत्) वह (आर्द्रम्) रस (अद्य) आज (सर्वदा) सदा से (समुद्रस्य) सींचनेवाले समुद्र के (स्रोत्याः) प्रवाहों के (इव) समान वर्तमान है ॥३॥"

भावार्थ : जिस रस वा उत्पादनशक्ति को, परमेश्वर ने सूर्य और भूमि को (कम्पमान) वश में रख के, सृष्टि के आदि में उत्पन्न किया था वह शक्ति मेघ आदि रस रूप से सदा संसार में सृष्टि की उत्पत्ति और स्थिति का कारण है ॥३॥

टिप्पणी :टिप्पणी−सायणभाष्य में (रोदसी इति) यह पदपाठ और उसका अर्थ [हे द्यावापृथिव्यौ] हे सूर्य और भूमि अशुद्ध है। यहाँ (रोदसी) एकवचन और केवल सूर्यवाची है क्योंकि (भूमिः च) [और भूमि] यह पद मन्त्र में वर्तमान हैं। फिर (भूमिः च) का भी अर्थ [भूमि और द्युलोक] उक्त भाष्य में है ॥ ३−यत्। आर्द्रम्। रोदसी। एकवचनं स्त्री। सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति रुध आवरणे−असुन्। षिद्गौरादिभ्यश्च। पा० ४।१।४१। इति ङीप्। द्युलोको भूमिर्वा। सम्बोधने दीर्घश्छान्दसः। हे रोदसि। सूर्यलोक। रेजमाने। रेजृ कम्पने−शानच्। भ्यसते रेजत इति भयवेपनयोः−निरु० ३।२१। उभे कम्पमाने। भूमिः। १।११।२। भवन्ति पदार्था अस्यामिति। पृथिवी। निः−अतक्षतम्। तक्षू तनूकरणे−लङ्। युवामुदपादयतम्। आर्द्रम्। अर्देर्दीघश्च। उ० २।१८। इति अर्द वधे, गतौ−रक्, दीर्घश्च। क्लेदनं रसत्वम् उत्पादनसामर्थ्यम्। तत्। प्रसिद्धम्। अद्य। १।१।१। वर्तमाने दिने। समुद्रस्य। १।३।८। समुन्दनशीलस्य सागरस्य, अर्णवस्य। स्रोत्याः। पुंलि०। स्रोतसो विभाषा ड्यड्यौ। पा० ४।४।११३। इति स्रोतस्-ड्य डित्त्वात् टिलोपः। स्रोतसि भवाः, जलप्रवाहाः ॥