Atharvaveda / 1 / 33 / 4
शि॒वेन॑ मा॒ चक्षु॑षा पश्यतापः शि॒वया॑ त॒न्वोप॑ स्पृशत॒ त्वचं॑ मे। घृ॑त॒श्चुतः॒ शुच॑यो॒ याः पा॑व॒कास्ता न॒ आपः॒ शं स्यो॒ना भ॑वन्तु ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 33 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : shantaatiH | Devta : chandramaaH, aapaH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : shivena maa chakShuShaa pashyataapaH shivayaa tanvopa spRRishata tvacha.m me. ghRRitashchutaH shuchayo yaaH paavakaastaa na aapaH sha.m syonaa bhavantu . 4.
Component Words : shivena . maa . chakShuShaa . pashyata . aapaH . shivayaa . tanvaa . upa . spRRishata . tvacham . me . ghRRita.ashchutaH . shuchayaH . yaaH . paavakaaH . taaH . naH . aapaH . sham . syonaaH . bhavantu .
In Hindi:
ऋषि : शन्तातिः | देवता : चन्द्रमाः, आपः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : सूक्ष्म तन्मात्राओं का विचार।
पदपाठ : शि॒वेन॑ । मा॒ । चक्षु॑षा । प॒श्य॒त॒ । आ॒प॒: । शि॒वया॑ । त॒न्वा । उप॑ । स्पृ॒श॒त॒ । त्वच॑म् । मे॒ । घृ॒त॒ऽश्चुत॑: । शुच॑य: । या: । पा॒व॒का: । ता: । न॒: । आप॑: । शम् । स्यो॒ना: । भ॒व॒न्तु॒ ॥
पदार्थ : (आपः) हे तन्मात्राओ ! (शिवेन) सुखप्रद (चक्षुषा) नेत्र से (मा) मुझको (पश्यत) तुम देखो, (शिवया) अपने सुखप्रद (तन्वा) रूप से (मे) मेरे (त्वचम्) शरीर को (उपस्पृशत) तुम स्पर्श करो। (याः) जो (आपः) तन्मात्राएँ (घृतश्चुतः) अमृत बरसानेवाली, (शुचयः) निर्मल स्वभाव और (पावकाः) शुद्धि जतानेवाली हैं, (ताः) वे [तन्मात्राएँ] (नः) हमारे लिये (शम्) शुभ करनेहारी और (स्योनाः) सुख देनेवाली (भवन्तु) होवें ॥४॥"
भावार्थ : (आपः) तन्मात्राएँ मुझे नेत्र से देखें, अर्थात् पूर्ण ज्ञान हमें प्राप्त हो और उससे हमारे शरीर और आत्मा स्वस्थ रहें। अथवा, (आपः) शब्द से तन्मात्राओं के ज्ञाता और वशयिता परमेश्वर वा विद्वान् पुरुष का ग्रहण है। जो मनुष्य सृष्टि के विज्ञान से शरीर का स्वास्थ्य और आत्मा की उन्नति करके उपकारी होते हैं, उनके लिये परमेश्वर की कृपा से सदा अमृत अर्थात् स्थिर सुख बरसता है ॥४॥
टिप्पणी :४−शिवेन। सर्वनिघृष्वरिष्व०। उ० १।१५३। इति शीङ् शयने यद्वा, शो तनूकरणे−वन्। शेरते विद्यन्ते शुभगुणा यत्र, वा श्यति अशुभानीति। सुखकरेण। मा। माम्। चक्षुषा। चक्षेः शिच्च। उ० २।११९। इति चक्ष कथने दर्शने च-उसि। स च शित्। शित्वात् ख्याञादेशाभावः। लोचनेन, नयनेन। पश्यत। अवलोकयत। आपः। म० १। हे सूक्ष्मतन्मात्राः। शिवया। कल्याण्या, इष्टप्राप्तिहेतुभूतया। तन्वा। १।१।१। रूपेण। उप+स्पृशत। संमृशत। त्वचम्। १।२४।२। शरीरम्। घृत-श्चुतः। घृ दीप्तौ सेके च-क्त। घृतं सारः, अमृतम्। श्चुतिर् क्षरणे क्विप्। अमृतस्राविण्यः अन्यद् व्याख्यातम् म० १ ॥