Atharvaveda / 1 / 34 / 3
मधु॑मन्मे नि॒क्रम॑णं॒ मधु॑मन्मे प॒राय॑णम्। वा॒चा व॑दामि॒ मधु॑मद्भू॒यासं॒ मधु॑संदृशः ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 34 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : atharvaa | Devta : madhuvanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : madhumanme nikramaNa.m madhumanme paraayaNam. vaachaa vadaami madhumadbhuuyaasa.m madhusa.mdRRishaH . 3.
Component Words : madhu.amata . me. ni.akramaNam . madhu.amat . me . paraa.aayanam . vaachaa . vadaami . madhu.amat . bhuuyaasam . madhu.asa.mdRRishaH .
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : मधुवनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदपाठ : मधु॑ऽमत । मे॒। नि॒ऽक्रम॑णम् । मधु॑ऽमत् । मे॒ । प॒रा॒ऽअय॑नम् । वा॒चा । व॒दा॒मि॒ । मधु॑ऽमत् । भू॒यास॑म् । मधु॑ऽसंदृश: ॥
पदार्थ : (मे) मेरा (निक्रमणम्) पास आना (मधुमत्) बहुत ज्ञानवाला वा रस में भरा हुआ और (मे) मेरा (परायणम्) बाहिर जाना (मधुमत्) बहुत ज्ञानवाला वा रस में भरा हुआ होवे। (वाचा) वाणी से मैं (मधुमत्) बहुत ज्ञानवाला वा रसयुक्त (वदामि) बोलूँ और मैं (मधुसन्दृशः) ज्ञान रूपवाला वा मधुर रूपवाला (भूयासम्) रहूँ ॥३॥"
भावार्थ : जो मनुष्य घर, सभा, राजद्वार, देश, परदेश आदि में आने, जाने, निरीक्षण, परीक्षण, अभ्यास आदि समस्त चेष्टाओं और वाणी से बोलने अर्थात् शुभ गुणों के ग्रहण और उपदेश करने में (मधुमान्) ज्ञानवान् वा रस से भरे अर्थात् प्रेम में मग्न होते हैं, वही महात्मा (मधुसन्दृश) रसीले रूपवाले अर्थात् संसार भर में शुभकर्मी होकर उपकार करते हैं ॥३॥
टिप्पणी :३−मधु-मत्। म० १। अतिविज्ञानयुक्तम्। मधुरसोपेतम्। नि-क्रम-णम्। नि+क्रमु गतौ−ल्युट्। निकटगमनम्, आगमनम्। परा-अयनम्। परा+अय गतौ−ल्युट्। दूरगमनम् प्रस्थानम्। वाचा। १।१।१। वाण्या। वदामि। वद वाचि−लिङर्थे लट्। कथ्यासम् उच्यासम्। भूयासम्। भू सत्तायाम्−आशिषि लिङ्। अहं स्याम्। मधु-सन्दृशः। इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः। पा० ३।१।१३५। इति मधु+सम्+दृशिर् प्रेक्षे=चाक्षुषज्ञाने−क। ज्ञानरसरूपः, मधुरदर्शनः ॥