Atharvaveda / 1 / 34 / 5
परि॑ त्वा परित॒त्नुने॒क्षुणा॑गा॒मवि॑द्विषे। यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 34 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : atharvaa | Devta : madhuvanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : pari tvaa paritatnunekShuNaagaamavidviShe. yathaa maa.m kaaminyaso yathaa mannaapagaa asaH .5.
Component Words : pari . tvaa . pari.atatnunaa . ikShuNaa . agaam . avi.adviShe . yathaa . maam . kaaminii . asaH . yathaa . mat . na . apa.agaa.NH . asaH .
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : मधुवनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदपाठ : परि॑ । त्वा॒ । प॒रि॒ऽत॒त्नुना॑ । इ॒क्षुणा॑ । अ॒गा॒म् । अवि॑ऽद्विषे । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगाँ: । अस॑: ॥
पदार्थ : (परितत्नुना) बहुत फैली हुई (इक्षुणा) लालसा के साथ [अथवा, ऊख जैसी मधुरता के साथ] (अविद्विषे) वैर छोड़ने के लिये (त्वा) तुझको (परि) सब ओर से (अगाम्) मैंने पाया है। (यथा) जिससे तू (माम् कामिनी) मेरी कामना करनेवाली (असः) होवे और (यथा) जिससे तू (मत्) मुझसे (अपगाः) बिछुड़नेवाली (न) न (असः) होवे ॥५॥"
भावार्थ : जब ब्रह्मचारी पूर्ण अभिलाषा से विद्या के लिये प्रयत्न करता है, तो कठिन से कठिन भी विद्या उसको अवश्य मिलती और अभीष्ट आनन्द देती है ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा २।३०।१ और ६।८।१-३ में भी है ॥
टिप्पणी :५−परि। सर्वतोभावेन। त्वा। त्वाम् मधुलतां विद्याम्। परि-तत्नुना। दाभाभ्यां नुः। उ० ३।३२। इति बाहुलकात्। तनु विस्तारे−नु प्रत्ययः। सर्वत्रव्याप्तेन। इक्षुणा। इषेः वसुः। उ० ३।१५७। इति इषु इच्छायाम्−क्सु। अभिलाषेण, यद्वा। गुडतृणेन प्रेमरूपेण। अगाम्। इण् गतौ−लुङ्। प्राप्तवानस्मि। अवि-द्विषे। न+वि+द्विष वैरे−भावे क्विप्। वैरत्यागार्थम्। यथा। येन प्रकारेण। माम्। ब्रह्मचारिणम्। कामिनी। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति काम−इनि। ङीप्। अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः। पा० २।३।७०। इति द्वितीया। माम् कामयमाना। असः। १।१६।४। त्वम् भवेः, भूयाः। मत्। मत्तः। न। निषेधे। अप-गाः। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति अप+गाङ् गतौ−विच्। अपयानशीला, प्रस्थानशीला, वियोगिनी ॥