Atharvaveda / 2 / 1 / 5
परि॒ विश्वा॒ भुव॑नान्यायमृ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं दृ॒शे कम्। यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॑मानशा॒नाः स॑मा॒ने योना॒वध्यैर॑यन्त ॥5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : venaH | Devta : brahmaatmaa | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : pari vishvaa bhuvanaanyaayamRRitasya tantu.m vitata.m dRRishe kam. yatra devaa amRRitamaanashaanaaH samaane yonaavadhyairayanta .5.
Component Words : pari . vishvaa . bhuvanaani . aayam . RRitasya . tantum. vi.atatam . dRRishe . kam . yatra . devaaH . amRRitam . aanashaanaaH . samaane . yonau . adhi . airayanta .1.5.
In Hindi:
ऋषि : वेनः | देवता : ब्रह्मात्मा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म के मिलने का उपदेश।
पदपाठ : परि॑ । विश्वा॑ । भुव॑नानि । आ॒य॒म् । ऋ॒तस्य॑ । तन्तु॑म्। विऽत॑तम् । दृ॒शे । कम् । यत्र॑ । दे॒वा: । अ॒मृत॑म् । आ॒न॒शा॒ना: । स॒मा॒ने । योनौ॑ । अधि॑ । ऐर॑यन्त ॥१.५॥
पदार्थ : (विश्वा=विश्वानि) सब (भुवनानि) लोकों में (परि=परीत्य) घूमकर (ऋतस्य) सत्यनियम के (विततम्) सब और फैले हुए (तन्तुम्) फैलनेवाले [अथवा वस्त्र में सूत के समान सर्वव्यापक] (कम्) प्रजापति परमेश्वर को (दृशे) देखने के लिये (आयम्) मैं [प्राणी] आया हूँ। (यत्र) जिस [परमात्मा] में (देवाः) तेजस्वी महात्मा (अमृतम्) अमृत [अमरण अर्थात् जीवन की सफलता वा अनश्वर आनन्द] को (आनशानाः) भोगते हुए (समाने) साधारण (योनौ) आदि कारण ब्रह्म में [प्रवृष्ट होकर] (अधि) ऊपर (ऐरयन्त) पहुँचे हैं ॥५॥"
भावार्थ : ध्यानी, धीर, वीर पुरुष सामान्यतः समष्टिरूप से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परीक्षा करके सब स्थान में व्यापक जगदीश्वर को साक्षात् करके आनन्द भोगते हैं और यह अनुभव करते हैं, कि सब महात्मा अपने को उस परम पिता में लय करके आत्मा की परम उन्नति करते हैं, अर्थात् जो स्वार्थ छोड़कर आत्मसमर्पण करते हैं, वही परोपकारी सज्जन परम आनन्द की सिद्धि [मुक्ति] को सदा हस्तगत करते हैं ॥५॥ यजुर्वेद अ० ३२ म० १० इस प्रकार है। स नो॒ बन्धु॑र्जनि॒ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद भुव॑नानि॒ विश्वा॑। यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॒मानशा॒नास्तृ॒तीये॒ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥१॥ वही हमारा बन्धु और उत्पन्न करनेहारा है और वही पोषण करनेहारा परमेश्वर सब (धामानि) अवस्थाओं और (भुवनानि) लोकों को जानता है, जिस तीसरे लोक परब्रह्म [प्राणियों और सब भुवनों के स्वामी] में तेजस्वीजन अमृत को भोगते हुए ऊपर पहुँचे हैं ॥
टिप्पणी :५–तन्तुम्। सितनिगमिमसि०। उ० १।६९। इति तनु विस्तारे–तुन्। तनोति विस्तृणोति तन्यते विस्तीर्यते वा स तन्तुः। विस्तारकम्। विस्तीर्णं सूत्रम्। पटस्य सूत्रवत् जगतः कारणभूतम्। विततम्। वि+तनु विस्तारे-क्त। विस्तृतम्। व्याप्तम्। दृशे। दृशे विख्ये च। पा० ३।४।११। इति दृशिर् प्रेक्षणे–तुमर्थे के प्रत्ययः। द्रष्टुम्। कम्। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति कमेः क्रमेर्वा–ड प्रत्ययः। क्रमते रेफलोपः। कः क्रमनो वा क्रमणो वा सुखो वा–निरु० १०।२२। प्रजापतिम्। विष्णुम्। ब्रह्म। सूर्य, सूर्यवत् प्रकाशकम्। सुखस्वरूपम्। यत्र। यस्मिन्। के परब्रह्मणि। देवाः। दिव्यगुणवन्तो महात्मानः। अमृतम्। म० २। अमरणम्। जीवनसाफल्यम्। मोक्षम्। आनशानाः। लिटः कानज्वा। पा० ३।२।१०६। इति अश् व्याप्तौ–कानच्। अश्नोतेश्च। पा० ७।४।७५। नुडागमः। चितः। पा० ६।१।१६३। इति अन्तोदात्तः। अश्नुवानाः। प्राप्नुवन्तः। समाने। सम्यग् अनिति नीयते वा। सम्+अन जीवने–घञ्, यद्वा, सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे–अच्। एकस्मिन्नेव। योनौ। वहिश्रिश्रुयुद्रु०। उ० ४।५१। इति यु मिश्रणामिश्रणयोः–नि। आदिकारणे। ब्रह्मणि। अध्यैरयन्त। ईर गतौ। ऊर्ध्वं गतवन्तः। अन्यद् व्याख्यातं सुगमं च ॥