Atharvaveda / 2 / 13 / 2
परि॑ धत्त ध॒त्त नो॒ वर्च॑से॒मं ज॒रामृ॑त्युं कृणुत दी॒र्घमायुः॑। बृह॒स्पतिः॒ प्राय॑छ॒द्वास॑ ए॒तत्सोमा॑य॒ राज्ञे॒ परि॑धात॒वा उ॑ ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 13 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : atharvaa | Devta : bRRihaspatiH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : pari dhatta dhatta no varchasema.m jaraamRRityu.m kRRiNuta diirghamaayuH. bRRihaspatiH praayaChadvaasa etatsomaaya raaj~ne paridhaatavaa u . 2.
Component Words : pari . dhatta . dhatta . naH . varchasaa . imam . jaraa.amRRityum . kRRiNuta . diirgham . aayuH . bRRihaspatiH . pra . ayachChat . vaasaH . etat . somaaya . raaj~ne . pari.adhaatavai . uu.m iti .13.2.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मचारी के समावर्त्तन, विद्यासमाप्ति पर वस्त्र आदि के लिये उपदेश।
पदपाठ : परि॑ । ध॒त्त॒ । ध॒त्त । न॒: । वर्च॑सा । इ॒मम् । ज॒राऽमृ॑त्युम् । कृ॒णु॒त॒ । दी॒र्घम् । आयु॑: । बृह॒स्पति॑: । प्र । अ॒य॒च्छ॒त् । वास॑: । ए॒तत् । सोमा॑य । राज्ञे॑ । परि॑ऽधात॒वै । ऊं॒ इति॑ ॥१३.२॥
पदार्थ : [हे विद्वानो !] (नः) हमारे लिये (इमम्) इस [ब्रह्मचारी] को (परि+धत्त) वस्त्र पहराओ और (वर्चसा) तेज वा अन्न से (धत्त) पुष्ट करो, [तथा इसका] (दीर्घम्) बड़ा (आयुः) आयु, वा आय, अर्थात् धनप्राप्ति और (जरामृत्युम्=जरा–अमृत्युं जरा–मृत्युं वा) स्तुति से अमरपन, अथवा, स्तुति वा बुढ़ापे से मृत्यु (कृणुत) करो। (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े [विद्वानों] के रक्षक [राजा वा प्रधानाचार्य] ने (एतत्) यह (वासः) वस्त्र (सोमाय) सूर्यसमान (राज्ञे) ऐश्वर्यवाले [ब्रह्मचारी] को (उ) ही (परिधातवै) धारण करने के लिये (प्र+अयच्छत्) दान किया है ॥२॥"
भावार्थ : जब ब्रह्मचारी विद्या समाप्त कर चुके, विद्वान् पुरुष परस्पर उपकार के लिये उसकी योग्यता का सत्कार करें और राजा वा आचार्य विशेष वस्त्र आदि से अलंकृत करके उसका मान बढ़ावें, जिससे विद्या का प्रचार और आपस में प्रीति अधिक होवे ॥२॥ २–जैसे विद्वान् पुरुष विद्यादि चिह्नों से अलंकृत होकर पुरुषों में दर्शनीय होता है, वैसे ही मनुष्य, मनुष्य शरीर का चोला पाकर सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ गिना जाता है ॥
टिप्पणी :टिप्पणी–यह मन्त्र अथर्ववेद १९।२४।३। में भी है ॥ २–परिधत्त। अन्तर्भावितण्यर्थः। परिधापयत। वस्त्रेण अलङ्कुरुत। धत्त। पोषयत। नः। अस्मभ्यम्। अस्मदर्थम्। वर्चसा। तेजसा। अन्नेन, निघ० ३।७। इमम्। दर्शनीयं ब्रह्मचारिणम्। जरामृत्युम्। जरा–अमृत्युं जरा–मृत्युं वा। षिद्भिदादिभ्योऽङ्। पा० ३।३।१०४। इति जॄष् वयोहानौ वेदे तु स्तुतौ च–अङ्। ऋदृशोऽङि गुणः। पा० ७।४।१६। इति गुणः। टाप्। जरा स्तुतिर्जरतेः स्तुतिकर्मणः–निरु० १०।८। भुजिमृङ्भ्यां युक्त्युकौ। उ० ३।२१। इति मृङ् प्राणत्यागे–त्युक्। जरया स्तुत्या अमृत्युम्। अमरत्वम्। यद्वा। जरया स्तुत्या वृद्धत्वेन वा मृत्युं मरणम्। कृणुत। कुरुत। दीर्घम्। विदारणे–घङ्। आयतम्। प्रवृद्धम्। आयुः। अ० १।३०।३। इण् गतौ–उसि। जीवितकालः। जीवनसाधनम्। आयः। धनप्राप्तिः। बृहस्पतिः। अ० १।८।२। बृहत्+पतिः, सुट्तलोपौ। बृहस्पतिर्बृहतः पाता वा पालयिता वा–निरु० १०।११। बृहतां विदुषां रक्षकः। प्र+अयच्छत्। दाण् दाने–लङ्। पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्०। पा० ७।३।७८। इति यच्छादेशः। अददात्। वासः। वसेर्णित्। उ० ४।२१८। इति वस आच्छादने–असुन्, स च णित्। वस्त्रम्। वासनम्। ज्ञानम्। एतत्। पुरोवर्त्ति। सोमाय। अ० १।६।२। षु प्रसवैश्वर्ययोः–मन्। सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेवेन्द्रियाणां जनितेत्यर्थः–निरु० १४।१२। सूर्यवत्तेजस्विने। राज्ञे। अ० १।१०।१। राजति=ईष्टे। निघ० २।२१। ऐश्वर्यवते पुरुषाय। परि–धातवै। तुमर्थे सेसेन्० पा० ३।४।९। इति तवै प्रत्ययः। परिधातुम्। उ। एव ॥