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Atharvaveda / 2 / 18 / 2

स॑पत्न॒क्षय॑णमसि सपत्न॒चात॑नं मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 18 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : चातनः | देवता : अग्निः | छन्द : द्विपदा साम्नीबृहती | स्वर :

विषय : शत्रुओं से रक्षा करनी चाहिये–इसका उपदेश।

पदपाठ : स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑णम् । अ॒सि॒ । स॒प॒त्न॒ऽचात॑नम् । मे॒ । दा॒: । स्वाहा॑ ॥१८.२॥

पदार्थ : [हे ईश्वर !] तू (सपत्नक्षयणम्) प्रकट शत्रुओं की नाशशक्ति (असि) है, (मे) मुझे (सपत्नचातनम्) प्रकट शत्रुओं के मिटाने का बल (दाः) दे, (स्वाहा) यह सुन्दर आशीर्वाद हो ॥२॥"

भावार्थ : जैसे ईश्वर वा राजा प्रकट कुचालियों का नाश करता है, वैसे ही मनुष्य अपने प्रकट दोषों का नाश करके सुख भोगे ॥२॥

टिप्पणी :२–सपत्नक्षयणम्। सह+पत गतौ, ऐश्ये–न, सहस्य सः। एकार्थे पतन्ति यतन्ते ते सपत्नाः। तेषां प्रकटशत्रूणां क्षयणं नाशनम्। अन्यद् गतम् ॥