Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 2 / 19 / 4

अग्ने॒ यत्ते॑ शो॒चिस्तेन॒ तं प्रति॑ शोच॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 19 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री | स्वर :

विषय : कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।

पदपाठ : अग्ने॑ । यत् । ते॒ । शो॒चि: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । शो॒च॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥१९.४॥

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्नि (यत्) जो (ते) तेरी (शोचिः) शोधनशक्ति है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (प्रति शोच) शुद्ध कर दे, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करता है, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करते हैं ॥४॥"

भावार्थ : दुराचारी, कामी, क्रोधी आदि पुरुष की मति भ्रष्ट हो जाती है और कुप्रयोग से शारीरिक और बाह्य अग्नि दुःखदायी होती और वही अग्नि सुप्रयोग से विचारशील सदाचारियों को सुखप्रद होती है। ऐसा ही आगे समझना चाहिये ॥१॥ ऐसा कहा भी है– गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः ॥ गुण, गुणवान् को प्राप्त करके निखर उठते हैं, परन्तु वही निर्गुणी को पाकर दोष हो जाते हैं ॥

टिप्पणी :४–शोचिः। अर्चिशुचि०। उ० २।१०८। इति ईशुचिर् शौचविशरणयोः–इसि। ज्वलतो नाम–निघ० १।१७। शुच्यत्यनेनेति। शोधनसामर्थ्यम्। शोच। शोचय, शोधय ॥