Atharvaveda / 2 / 21 / 5
सूर्य॒ यत्ते॒ तेज॒स्तेन॒ तम॑ते॒जसं॑ कृणु॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 21 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : atharvaa | Devta : suuryaH | Metre : ekaavasaanaanichRRidviShamaatripaadgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : suurya yatte tejastena tamatejasa.m kRRiNu yo3 .asmaandveShTi ya.m vaya.m dviShmaH .5.
Component Words : suurya . yat . te . tejaH . tena . tam . atejasam . kRRiNu . yaH . asmaan . dveShTi . yam . vayam . dviShmaH .21.5.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : सूर्यः | छन्द : एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री | स्वर :
विषय : कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदपाठ : सूर्य॑ । यत् । ते॒ । तेज॑: । तेन॑ । तम् । अ॒ते॒जस॑म् । कृ॒णु॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥२१.५॥
पदार्थ : (सूर्य) हे सूर्य [सूर्यमण्डल !] (यत्) जो (ते) तेरा (तेजः) तेज है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (अतेजसम्) निस्तेज (कृणु) कर दे, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥५॥"
भावार्थ : सूर्य सृष्टि के पदार्थों को वीर्यवान् और तेजस्वी करता है, किन्तु वही कुप्रयोग से दुःखदायी और सुप्रयोग से सुखदायी होता है ॥१॥
टिप्पणी :५–सूर्य। अ० १।३।५। हे सरणशील ! हे प्रेरणशील ! आदित्य ! अन्यदुपरिगतम् ॥ २, ३, ४, ५–उपरि व्याख्यातः ॥