Atharvaveda / 2 / 23 / 3
आपो॒ यद्वो॒ऽर्चिस्तेन॒ तं प्र॑त्यर्चत॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 23 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : atharvaa | Devta : aapaH | Metre : ekaavasaanaasamaviShamaatripaadgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aapo yadvo.archistena ta.m pratyarchata yo3 .asmaandveShTi ya.m vaya.m dviShmaH . 3.
Component Words : aapaH . yat . vaH . archiH . tena . tam . prati . archata . yaH . asmaan . dveShTi . yam . vayam . dviShmaH.23.3.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : आपः | छन्द : एकावसानासमविषमात्रिपाद्गायत्री | स्वर :
विषय : कुप्रयोग त्याग के लिये उपदेश।
पदपाठ : आप॑: । यत् । व॒: । अ॒र्चि: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । अ॒र्च॒त॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म:॥२३.३॥
पदार्थ : (आपः) हे जलो ! (यत्) जो (वः) तुम्हारी (अर्चिः) दीपनशक्ति है, (तेन) उससे (तम् प्रति) उस [दोष] पर (अर्चत) प्रदीप्त हो, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥३॥"
भावार्थ : वृष्टि, नदी, कूप आदि का जल अनावृष्टि दोषों को मिटाकर अन्न आदि पदार्थों को उत्पन्न करके प्राणियों को बल और सुख देता है और वही कुप्रबन्ध से दुःख का कारण होता है, ऐसे ही राजा सामाजिक नियमों के विरोधी दुष्टों का नाश करके प्रजा को समृद्ध करता और सुख देता है ॥१॥