Atharvaveda / 2 / 24 / 5
जूर्णि॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनीः। यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : brahmaa | Devta : aayuH | Metre : chatuShpadaa bRRihatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : juurNi punarvo yantu yaatavaH punarhetiH kimiidiniiH. yasya stha tamatta yo vaH praahaittamatta svaa maa.msaanyatta . 5.
Component Words : juurNi . punaH . vaH . yantu . yaatavaH . punaH . hetiH . kimiidiniiH . yasya . stha . tam . atta . yaH . vaH . pra.aahait . tam . atta . svaa . maa.msaani . atta .24.5.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आयुः | छन्द : चतुष्पदा बृहती | स्वर :
विषय : म० १–४ कुसंस्कारों के और ५–८ कुवासनाओं के नाश का उपदेश।
पदपाठ : जूर्णि॑ । पुन॑: । व॒: । य॒न्तु॒ । या॒तव॑: । पुन॑: । हे॒ति: । कि॒मी॒दि॒नी॒: । यस्य॑ । स्थ । तम् । अ॒त्त॒ । य: । व॒: । प्र॒ऽअहै॑त् । तम् । अ॒त्त॒ । स्वा । मां॒सानि॑ । अ॒त्त॒ ॥२४.५॥
पदार्थ : (जूर्णि) अरी जूड़ी [जाड़े के ज्वर] ! (किमीदिनीः=०–न्यः) अरी तुम लुतरियों ! [कुवासनाओं !] (वः) तुम्हारी (यातवः) पीड़ाएँ और (हेतिः) चोट (पुनः-पुनः) लौट-लौट कर (यन्तु) चली जावें। तुम (यस्य) जिसके [साथी] (स्थ) हो, (तम्) उस [पुरुष] को (अत्त) खाओ, (यः) जिस [पुरुष] ने (वः) तुमको (प्राहैत्=प्राहैषीत्) भेजा है, (तम्) उसको (अत्त) खाओ, (स्वा=स्वानि) अपने ही (मांसानि) माँस की बोटियाँ (अत्त) खाओ ॥५॥"
भावार्थ : जो नीतिज्ञ पुरुष अपने मन की कुवासनाओं और उनके कारण को जानकर उनको सर्वथा मिटाता है, वह वशिष्ठ महा उपकारी जितेन्द्रिय होकर संसार का उपकार करके आनन्दित होता है ॥५॥
टिप्पणी :५–जूर्णि। वीज्याज्वरिभ्यो निः। उ० ४।४८। इति ज्वर रोगे–नि। ज्वरत्वरस्रिव्यवि०। पा० ६।४।२०। इति वकारोपधयोरूठ्। शीतज्वरवद् दुःखप्रदकुवासने। किमीदिनीः। ऋन्नेभ्यो ङीप्। पा० ४।१।५। इति ङीप्। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। किमीदिन्यः। पिशुन्यः ॥