Atharvaveda / 2 / 36 / 2
सोम॑जुष्टं॒ ब्रह्म॑जुष्टमर्य॒म्णा संभृ॑तं॒ भग॑म्। धा॒तुर्दे॒वस्य॑ स॒त्येन॑ कृ॒णोमि॑ पति॒वेद॑नम् ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 36 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : pativedanaH | Devta : somaH, aryamaa, dhaataa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : somajuShTa.m brahmajuShTamaryamNaa sa.mbhRRita.m bhagam. dhaaturdevasya satyena kRRiNomi pativedanam . 2.
Component Words : soma.ajuShTam . brahma.ajuShTam . aryamNaa . sam.abhRRitam . bhagam . dhaatuH . devas.Nya . satyena . kRRiNomi . pati.avedanam .36.2.
In Hindi:
ऋषि : पतिवेदनः | देवता : सोमः, अर्यमा, धाता | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : विवाह संस्कार का उपदेश।
पदपाठ : सोम॑ऽजुष्टम् । ब्रह्म॑ऽजुष्टम् । अ॒र्य॒म्णा । सम्ऽभृ॑तम् । भग॑म् । धा॒तु: । दे॒वस्य॑ । स॒त्येन॑ । कृ॒णोमि॑ । प॒ति॒ऽवेद॑नम् ॥३६.२॥
पदार्थ : (धातुः) सबके धारण करनेवाले (देवस्य) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर के (सत्येन) सत्यनियम से (सोमजुष्टम्) ऐश्वर्यवान् पुरुषों के प्रिय, (ब्रह्मजुष्टम्) ब्रह्मज्ञानी पुरुषों से सेवित और (अर्यम्णा) श्रेष्ठों के मान करनेवाले राजा से (संभृतम्) पुष्ट किये हुए (भगम्) सेवनीय वा ऐश्वर्ययुक्त (पतिवेदनम्) पत्नी [वा पति] की प्राप्ति [विवाह] (कृणोमि) मैं करता [वा करती] हूँ ॥२॥"
भावार्थ : यह गृहस्थाश्रम ईश्वरकृत नियम है। इसकी रक्षा के लिये सब बड़े-बड़े महात्मा प्रयत्न करते और राजा नियम बनाते हैं। उसके निर्वाह के लिये माता-पिता आदि वर और कन्या को यथावत् उपदेश करें और उनका विवाह करें ॥२॥
टिप्पणी :२–सोमजुष्टम्। अर्त्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति षु प्रसवैश्वर्ययोः–मन्। जुषी प्रीतिसेवनयोः–क्त। ऐश्वर्यवद्भिः प्रीतम्। ब्रह्मजुष्टम्। बृंहेर्नोऽच्च। उ० ४।१४६। इति बृहि वृद्धौ–मनिन्, नस्य अकारः। ब्रह्मभिः अधीतवेदैर्ब्राह्मणैर्ब्रह्मज्ञानिभिः सेवितम्। अर्यम्णा। अ० १।११।१। अर्यमादित्योऽरीन् नियच्छति–नि० ११।२३। श्रेष्ठाणां मानकर्त्रा, न्यायकारिणा राज्ञा। सम्भृतम्। सम्यक् पोषितं वर्धितम्। भगम्। पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।३।११८। इति भज सेवायाम्–घ। चजोः कु घिण्ण्यतोः। पा० ७।२।५२। इति जस्य गः। भजनीयम्। सेवनीयम्। ऐश्वर्ययुक्तम्। धातुः। सर्वस्य धारकस्य पोषकस्य। देवस्य। प्रकाशमयस्य परमेश्वरस्य। सत्येन। सते हितम्, सत्–यत्। यथार्थधर्मेण। कृणोमि। करोमि। पतिवेदनम्। विद्लृ लाभे, विद ज्ञाने–ल्युट्। वेदनम्=विवाहः। ज्ञानम्। पुमान् स्त्रिया। पा० १।२।६७। इति पत्नी च पतिश्च पती तयोर्वेदनं लाभं ज्ञानं विवाहं वा ॥