Atharvaveda / 3 / 7 / 3
अ॒दो यद॑व॒रोच॑ते॒ चतु॑ष्पक्षमिव छ॒दिः। तेना॑ ते॒ सर्वं॑ क्षेत्रि॒यमङ्गे॑भ्यो नाशयामसि ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 7 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : hariNaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ado yadavarochate chatuShpakShamiva ChadiH. tenaa te sarva.m kShetriyama~Ngebhyo naashayaamasi . 3.
Component Words : adaH . yat . ava.arochate . chatuShpakSham.aiva . ChadiH . tena . te . sarvam . kShetriyam . a~NgebhyaH . naashayaamasi .7.3.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : हरिणः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : रोग नाश करने के लिए उपदेश।
पदपाठ : अ॒द: । यत् । अ॒व॒ऽरोच॑ते । चतु॑ष्पक्षम्ऽइव । छ॒दि: । तेन॑ । ते॒ । सर्व॑म् । क्षे॒त्रि॒यम् । अङ्गे॑भ्य: । ना॒श॒या॒म॒सि॒ ॥७.३॥
पदार्थ : (अदः) वह (यत्) जो [वा पूजनीय ब्रह्म] (चतुष्पक्षम्) याचनीय व्यवहारों से युक्त, अथवा चार पक्षवाले (छदिः इव) घर के समान (अवरोचते) चमकता है। (तेन) उसके द्वारा (ते अङ्गेभ्यः) तेरे अङ्गों से (सर्वम्) सब (क्षेत्रियम्) शरीर वा वंश के रोग को (नाशयामसि=०−मः) हम नाश करते हैं ॥३॥ "
भावार्थ : ज्ञानी पुरुष उस सर्वत्र विराजमान परब्रह्म की रचनाओं में उत्तम कर्मों से युक्त घर के समान आनन्द पाकर अपने सब विघ्नों का सब जगह नाश करके आगे बढ़े चले जाते हैं ॥३॥ २−हरिण के सींग आदि औषध से रोग नष्ट करना चाहिये ॥३॥
टिप्पणी :३−(अदः)। न+दसु उत्क्षेपे-क्विप्। एतत्। पुरोवर्त्ति। (यत्)। त्यजितनियजि०। उ० १।१३२। इति यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु-अदि, स च डित्। सर्वत्र संगतं सर्वपूजनीयं ब्रह्म। अथवा, सर्वनामैतत्। (अवरोचते)। निश्चयेन व्याप्य वा दीप्यते। (चतुष्पक्षम्)। चते याचने-उरन्। म० २। गृधिपण्योर्दकौ च। उ० ३।६९। इति षणङ् व्यवहारे स्तुतौ च-स, कश्चान्तादेशः। यद्वा। पक्ष परिग्रहे-घञ्। याचनीयव्यवहारयुक्तम्। चतुकोषो वा। (छदिः)। अर्चिशुचिहुसृपिछदिछर्दिभ्य इसिः। ड० २।१०८। इति छद संवृतौ+णिच्-इसि। इस्मन्त्रन्क्विप्। पा० ६।४।९७। इति ह्रस्वः। पटलम्। गृहम्। आच्छादनम्। (तेन)। ब्रह्मणा। (ते)। तव। (सर्वम्)। अखिलम्। (क्षेत्रियम्)। नाशकरं रोगम्। (अङ्गेभ्यः)। शरीरावयवेभ्यः। (नाशयामसि)। वयं नाशयामः ॥