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Atharvaveda / 3 / 10 / 4

इ॒यमे॒व सा या प्र॑थ॒मा व्यौच्छ॑दा॒स्वित॑रासु चरति॒ प्रवि॑ष्टा। म॒हान्तो॑ अस्यां महि॒मानो॑ अ॒न्तर्व॒धूर्जि॑गाय नव॒गज्जनि॑त्री ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रात्रिः, धेनुः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : पुष्टि बढ़ाने के लिये प्रकृति का वर्णन।

पदपाठ : इ॒यम् । ए॒व । सा । या । प्र॒थ॒मा । वि॒ऽऔच्छ॑त् । आ॒सु । इत॑रासु । च॒र॒ति॒ । प्रऽवि॑ष्टा । म॒हान्त॑: । अ॒स्या॒म् । म॒हि॒मान॑: । अ॒न्त: । व॒धू: । जि॒गा॒य॒ । न॒व॒ऽगत् । जनि॑त्री ॥१०.४॥

पदार्थ : (इयम् एव) यही (सा) वह ईश्वरी, [रात्रि, प्रकृति] है (या जो प्रथमा) प्रथम (वि-औच्छत्) प्रकाशमान हुई है और (आसु) इन सब और (इतरासु) दूसरी [सृष्टियों] में (प्रविष्टा) प्रविष्ट होकर (चरति) विचरती है। (अस्याम् अन्तः) इसके भीतर (महान्तः) बड़ी-२ (महिमानः) महिमायें हैं। उस (नवगत्) नवीन-२ गतिवाली (वधूः) प्राप्ति योग्य (जनित्री) जननी ने [अनर्थों को] (जिगाय) जीत लिया है ॥४॥ "

भावार्थ : परमाणुरूपा प्रकृति जगत् के सब पदार्थों में प्रविष्ट है। विद्वान् लोग जैसे-२ खोजते हैं, उसकी नवीन-२ शक्तियों का प्रादुर्भाव करके सुख पाते हैं ॥४॥

टिप्पणी :४−(इयम्)। परिदृश्यमाना। (एव)। हि। (सा)। म० १। ईश्वरी। (या)। रात्रिः प्रकृतिः। (प्रथमा)। म० १। आद्या। (व्यौच्छत्)। वि+उछी वि-वासे लङ्। अदीप्यत। (आसु)। परिदृश्यमानासु। (इतरासु)। इण् गतौ-क्विप् ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति इ+तॄ तरणे अभि भव च-अप्, टाप्। इः कामः। ईन् कामान् तरतीति इतरा। कामानां शुभकामानां तारयित्रीषु सृष्टिषु। अन्यासु। (चरति)। गच्छति। (प्रविष्टा)। अनुप्रविष्टा। (महान्तः)। विशालाः। (महिमानः)। पृथ्वीदिभ्य इमनिज् वा। पा० ५।१।१२२। इति महत्-इम निच्। टिलोपः। ऐश्वर्याणि। प्रभावाः। (अन्तः)। मध्ये। (वधूः)। वहेर्धश्च। उ० १।८३। इति वह प्रापणे-ऊ प्रत्ययः। वहनयोग्या। प्राप्या। (जिगाय)। जि जये-लिट्। जितवती विघ्नान्। (नवगत्)। णु स्ततौ-अप्। नवः स्तुत्यः नूतनः। नवपूर्वाद् गमेः क्विप्। गमः क्वौ। पा० ६।४।४०। इत्यनुनासिकलोपः। ह्रस्वस्य पिति कृति०। पा० ६।१।७१। इति तुक्। प्रशस्यगतियुक्ता। नवीनगतिवती। (जनित्री)। अ० २।१।३। जनितृ-ङीप्। जनयित्री जगज्जननी ॥