Atharvaveda / 3 / 10 / 10
ऋ॒तुभ्य॑ष्ट्वार्त॒वेभ्यो॑ मा॒द्भ्यः सं॑वत्स॒रेभ्यः॑। धा॒त्रे वि॑धा॒त्रे स॒मृधे॑ भू॒तस्य॒ पत॑ये यजे ॥ 10॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 10
In English:
Seer : atharvaa | Devta : dhaataa, vidhaataa, RRitavaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : RRitubhyaShTvaartavebhyo maadbhyaH sa.mvatsarebhyaH. dhaatre vidhaatre samRRidhe bhuutasya pataye yaje . 10.
Component Words : RRitu.abhyaH . tvaa . aartavebhyaH . maat.abhyaH . sam.avatsarebhyaH . dhaatre . vi.adhaatre . sam.aRRidhe . bhuutasya . pataye . yaje .10.10.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : धाता, विधाता, ऋतवः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : पुष्टि बढ़ाने के लिये प्रकृति का वर्णन।
पदपाठ : ऋ॒तुऽभ्य॑: । त्वा । आ॒र्त॒वेभ्य॑: । मा॒त्ऽभ्य॑: । स॒म्ऽव॒त्स॒रेभ्य॑: । धा॒त्रे । वि॒ऽधा॒त्रे । स॒म्ऽऋधे॑ । भू॒तस्य॑ । पत॑ये । य॒जे॒ ॥१०.१०॥
पदार्थ : [हे काष्ठ के प्रकृति !] (त्वा) तुझको (ऋतुभ्यः) ऋतुओं के लिए, (आर्तवेभ्यः) ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थों के लिए, (माद्भ्यः) महीनों के लिए और (संवत्सरेभ्यः) यथावत् निवास देनेवाले वर्षों के [सुधार के] लिए, (धात्रे) धारण करनेवाले, (विधात्रे) रचनेवाले, (समृधे) यथा नियम बढ़ानेवाले (भूतस्य) जगत् के (पतये) पति के लिए (यजे) मैं समर्पण करता हूँ ॥१०॥ "
भावार्थ : परमेश्वर-नियम से जगत् की उत्पन्न करनेवाली प्रकृति की चेष्टाओं को सब ऋतुओं में देखते हुए विद्वान् लोग अपने समय को उपकार में लगाते हैं ॥१०॥
टिप्पणी :१०-(ऋतुभ्यः)। म० ९। वसन्तादीनां प्रीत्यर्थम्। (त्वा)। त्वाम्। एकाष्टकाम्। प्रकृतिम्। (आर्तवेभ्यः)। म० ९। ऋतूद्भवेभ्यः। (माद्भ्यः)। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति मासशब्दस्य मास् इत्यादेशः। सस्य तः मासेभ्यः। (संवत्सरेभ्यः)। म० २। वर्षेभ्यः। (धात्रे)। धारयित्रे। (विधात्रे)। सर्वस्य निर्मात्रे। (समृधे)। सम्+ऋधु वृद्धौ-क्विप्। समर्धयित्रे। अन्य। गतम्-९ ॥