Atharvaveda / 3 / 22 / 3
येन॑ ह॒स्ती वर्च॑सा संब॒भूव॒ येन॒ राजा॑ मनु॒ष्ये॑ष्व॒प्स्व१॒॑न्तः। येन॑ दे॒वा दे॒वता॒मग्र॒ आय॒न्तेन॒ माम॒द्य वर्च॒साग्ने॑ वर्च॒स्विनं॑ कृणु ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 22 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : bRRihaspatiH, vishvedevaaH, varchaH | Metre : pa~nchapadaa paraanuShTubviraaDatijagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yena hastii varchasaa sa.mbabhuuva yena raajaa manuShyeShvapsva1ntaH. yena devaa devataamagra aayantena maamadya varchasaagne varchasvina.m kRRiNu . 3.
Component Words : yena . hastii . varchasaa . sam.ababhuuva . yena . raajaa . manuShye᳡Shu . ap.asu . antaH . yena . devaaH . devataam . agre . aayan . tena . maam . adya . varchasaa . agne . varchasvinam . kRRiNu .22.3.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : बृहस्पतिः, विश्वेदेवाः, वर्चः | छन्द : पञ्चपदा परानुष्टुब्विराडतिजगती | स्वर :
विषय : कीर्ति पाने के लिये उपदेश।
पदपाठ : येन॑ । ह॒स्ती । वर्च॑सा । स॒म्ऽब॒भूव॑ । येन॑ । राजा॑ । म॒नु॒ष्ये᳡षु । अ॒प्ऽसु । अ॒न्त: । येन॑ । दे॒वा: । दे॒वता॑म् । अग्रे॑ । आय॑न् । तेन॑ । माम् । अ॒द्य । वर्च॑सा । अग्ने॑ । व॒र्च॒स्विन॑म् । कृ॒णु॒ ॥२२.३॥
पदार्थ : (येन) जिस (वर्चसा) तेज से (हस्ती) हाथी, और (येन) जिस [तेज] से (राजा) ऐश्वर्यवान् राजा (मनुष्येषु) मनुष्यों और (अप्सुअन्तः) जल और अन्तरिक्ष के भीतर (संबभूव) पराक्रमी हुआ है, और (येन) जिस [तेज] से (देवाः) देवताओं [महात्मा पुरुषों] ने (अग्रे) पहिले काल में (देवताम्) देवतापन (आयन्) पाया है, (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर ! (तेन वर्चसा) उस तेज से (माम्) मुझको (अद्य) आज (वर्चस्विनम्) तेजस्वी (कृणु) कर ॥३॥"
भावार्थ : सब स्त्री पुरुष हाथी आदि पशुओं, और पूर्वज शूरवीर ऋषि महात्माओं के बुद्धि बल का अनुभव करके (अद्य) आज अर्थात् शीघ्र उपाय से जल, थल, और आकाश में, (अग्नि) परमेश्वर की भक्ति के साथ अपनी गति बढ़ावें और अग्नि के समान तेजस्वी होकर संसार में कीर्तिमान् होवें ॥३॥ योगेश्वर पतञ्जलि का वचन है−तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ यो० द० १।२१ ॥ [समाधिलाभ] उग्र अच्छे वेगवालों के समीप होता है ॥
टिप्पणी :३−(हस्ती) म० १। गजः। (वर्चसा) तेजसा। (संबभूव) समर्थो बभूव। (राजा) राजति ईष्टे स राजा। ऐश्वर्यवान् पुरुषः। (मनुष्येषु) अ० ३।४।६। मनु-यत्, षुगागमः। मननशीलेषु। स्थलप्राणिषु, इत्यर्थः। (अप्सु) उदकेषु-निघ० १।१२। अन्तरिक्षे-निघ० १।३। (अन्तः) मध्ये। (देवाः) विजिगीषवो महात्मानः। (देवताम्) देवत्वम्। माहात्म्यम्। (अग्रे) पर्वकाले। (आयन्) इण् गतौ-लङ्। प्राप्नुवन्। (माम्) उपासकम्। (अद्य) अ० १।१।१। अस्मिन् दिने। तत्कालम्। (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन्। (वर्चस्विनम्) तेजस्विनम्। (कृणु) कुरु ॥