Atharvaveda / 3 / 28 / 3
शि॒वा भ॑व॒ पुरु॑षेभ्यो॒ गोभ्यो॒ अश्वे॑भ्यः शि॒वा। शि॒वास्मै सर्व॑स्मै॒ क्षेत्रा॑य शि॒वा न॑ इ॒हैधि॑ ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 28 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : brahmaa | Devta : yaminii | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : shivaa bhava puruShebhyo gobhyo ashvebhyaH shivaa. shivaasmai sarvasmai kShetraaya shivaa na ihaidhi . 3.
Component Words : shivaa . bhava . puruShebhyaH . gobhyaH . ashvebhyaH . shivaa . shivaa . asmai . sarvasmai . kShetraaya . shivaa . naH . iha . edhi .28.3.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : यमिनी | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : उत्तम नियम से सुख होता है।
पदपाठ : शि॒वा । भ॒व॒ । पुरु॑षेभ्य: । गोभ्य॑: । अश्वे॑भ्य: । शि॒वा । शि॒वा । अ॒स्मै । सर्व॑स्मै । क्षेत्रा॑य । शि॒वा । न॒: । इ॒ह । ए॒धि॒ ॥२८.३॥
पदार्थ : (हे यमिनि) उत्तम नियमवाली बुद्धि ! (पुरुषेभ्यः) पुरुषों के लिये (शिवा) कल्याणी और (गोभ्यः) गौओं को और (अश्वेभ्यः) घोड़ों को (शिवा) कल्याणी (भव) हो, (इह) यहाँ (अस्मै सर्वस्मै क्षेत्राय) इस सब खेत को (शिवा) कल्याणी और (नः) हमको (शिवा) कल्याणी (एधि) हो ॥३॥"
भावार्थ : मनुष्य ईश्वर ज्ञान से उत्तम बुद्धि पाकर सब संसार को सुखदायी होता है ॥३॥
टिप्पणी :३−(क्षेत्राय) अ० २।८।५। शालिगोधूमादिकेदारवर्धनाय (एधि) अस्तेर्लोटि रूपम्। भव। अन्यत् स्पष्ठम् ॥