Atharvaveda / 3 / 29 / 3
यो ददा॑ति शिति॒पाद॒मविं॑ लो॒केन॒ संमि॑तम्। स नाक॑म॒भ्यारो॑हति॒ यत्र॑ शु॒ल्को न क्रि॒यते॑ अब॒लेन॒ बली॑यसे ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 29 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : uddaalakaH | Devta : shitipaad aviH | Metre : pathyaapa~NktiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yo dadaati shitipaadamavi.m lokena sa.mmitam. sa naakamabhyaarohati yatra shulko na kriyate abalena baliiyase . 3.
Component Words : yaH . dadaati . shiti.apaadam . avim . lokena . sam.amitam . saH . naakam . abhi.aaarohati . yatra . shulkaH . na . kriyate . abalena . baliiyase .29.3.
In Hindi:
ऋषि : उद्दालकः | देवता : शितिपाद् अविः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :
विषय : मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।
पदपाठ : य: । ददा॑ति । शि॒ति॒ऽपाद॑म् । अवि॑म् । लो॒केन॑ । सम्ऽमि॑तम् । स: । नाक॑म् । अ॒भि॒ऽआरो॑हति । यत्र॑ । शु॒ल्क: । न । क्रि॒यते॑ । अ॒ब॒लेन॑ । बली॑यसे ॥२९.३॥
पदार्थ : (यः) जो कोई (लोकेन) संसार करके (संमितम्) सम्मान किये गए, (शितिपादम्) प्रकाश और अन्धकार में गतिवाले (अविम्) रक्षक प्रभु का [अपने आत्मा में] (ददाति) दान करता है, (सः) वह पुरुष (नाकम्) दुःखरहित स्वर्ग को (अभ्यारोहति) चढ़ जाता है, (तत्र) जहाँ पर (अबलेन) निर्बल करके (बलीयसे) अधिक बलवान् को (शुल्कः) शुल्क [कर] (न) नहीं (क्रियते) किया जाता है ॥३॥"
भावार्थ : जो कोई सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म को अपने में ग्रहण करता है, वह सन्मार्गी बड़ों और छोटों के साथ एक सा न्याय करता हुआ सदा आनन्द भोगता है ॥३॥
टिप्पणी :३−(यः) यः कश्चित् (ददाति) स्वात्मने प्रयच्छति, समर्पयति। (शितिपादम्) म० १। प्रकाशान्धकारगतिमन्तम्। (अविम्) म० १। प्रभुम्। (लोकेन) संसारेण (संमितम्) माङ् माने-क्त। द्यतिस्यतिमास्थामित् ति किति। पा० ७।४।४०। इति इकारः सन्मानितः (नाकम्) अ० १।९।२, न+अकम्। स्वर्गम्। सुखम् (अभ्यारोहति) अभित आरूढो भवति। अभिप्राप्नोति (यत्र) स्वर्गे (शुल्कः) शुल्क कथने, सर्जने, वर्जने च-घञ्। करः (न) निषेधे (क्रियते) दीयते (अबलेन) निर्बलेन (बलीयसे) बलवत्-ईयसुन्। विन्मतोर्लुक्। पा० ५।३।६५। इति मतोर्लुक्। बलवत्तराय ॥