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Atharvaveda / 3 / 31 / 3

वि ग्रा॒म्याः प॒शव॑ आर॒ण्यैर्व्याप॒स्तृष्ण॑यासरन्। व्य१॒॑हं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 31 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : पशुसमूहः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : आयु बढ़ाने का उपदेश।

पदपाठ : वि । ग्रा॒म्या: । प॒शव॑: । आ॒र॒ण्यै: । वि । आप॑: । तृष्ण॑या । अ॒स॒र॒न् । वि । अ॒हम् । सर्वे॑ण । पा॒प्मना॑ । वि । यक्ष्मे॑ण । सम् । आयु॑षा ॥३१.३॥

पदार्थ : (ग्राम्याः) ग्रामवाले (पशवः) जीव (आरण्यैः) जङ्गली जीवों से (वि) अलग, और (आपः) जल (तृष्णया) पियास से (वि) अलग, (असरन्) चले हैं। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से (वि) अलग और (यक्ष्मेण) राजरोग, क्षयी आदि से (वि=विवर्त्तै) अलग रहूँ और (आयुषा) जीवन [उत्साह] से (सम्=सम् वर्तै) मिला रहूँ ॥३॥"

भावार्थ : जैसे ग्राम्य पशु जङ्गली जीवों से अलग रहकर प्रसन्न रहते हैं और जल की उपस्थिति में पियास से निवृत्ति होती है, इसी प्रकार मनुष्य पाप से निवृत्त होकर सबके सुख में प्रवृत्त हों ॥३॥

टिप्पणी :३−(ग्राम्याः) अ० २।३४।४। ग्राम-य। ग्रामीणाः। (आरण्यैः) अरण्य-ष्यञ्। अरण्यजातैः। (आपः) जलानि। (तृष्णया) तृषिशुषिरसिभ्यः कित्। उ० ३।१२। इति तृषिर् आकाङ्क्षायाम्-न, स च कित्। टाप् पानेच्छया। पिपासया। (वि असरन्) सृ गतौ-लुङ्। विगता अभूवन्। अन्यद् गतम् ॥