Atharvaveda / 4 / 12 / 2
यत्ते॑ रि॒ष्टं यत्ते॑ द्यु॒त्तमस्ति॒ पेष्ट्रं॑ त आ॒त्मनि॑। धा॒ता तद्भ॒द्रया॒ पुनः॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 12 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : RRibhuH | Devta : vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yatte riShTa.m yatte dyuttamasti peShTra.m ta aatmani. dhaataa tadbhadrayaa punaH sa.m dadhatparuShaa paruH . 2.
Component Words : yat . te . riShTam . yat . te . dyuttam . asti . peShTram . te . aatmani . dhaataa . tat . bhadrayaa . punaH . sam . dadhat . paruShaa . paruH .12.2.
In Hindi:
ऋषि : ऋभुः | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : अपने दोष मिटाने का उपदेश।
पदपाठ : यत् । ते॒ । रि॒ष्टम् । यत् । ते॒ । द्यु॒त्तम् । अस्ति॑ । पेष्ट्र॑म् । ते॒ । आ॒त्मनि॑ । धा॒ता । तत् । भ॒द्रया॑ । पुन॑: । सम् । द॒ध॒त् । परु॑षा । परु॑: ॥१२.२॥
पदार्थ : [हे मनुष्य !] (यत्) जो कुछ (ते) तेरा (रिष्टम्) टूटा हुआ और (यत्) जो (ते) तेरा (द्युत्तम्) जलता हुआ, और जो (ते) तेरे (आत्मनि) शरीर में (पेष्ट्रम्) पिसा हुआ (अस्ति) है। (धाता) पोषण करनेवाला वैद्य (भद्रया) कल्याण करनेवाली क्रिया से (तत् परुः) उस जोड़ को (परुषा) दूसरे जोड़ से (पुनः) फिर (सं दधत्) सन्धि कर देवे ॥२॥"
भावार्थ : विचारवान् पुरुष आप ही अपने दोषों का वैद्य होता है ॥२॥
टिप्पणी :२−(यत्) अङ्गम् (ते) तव (द्युत्तम्) द्योतते, ज्वलतिकर्मा-निघ० १।१६। द्योतितम्। प्रज्वलितम् (अस्ति) (पेष्ट्रम्) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति पिष्लृ चूर्णे-ष्ट्रन्। पिष्टम्। चूर्णितम् (आत्मनि) शरीरे (धाता) पोषयिता पुरुषः (तत्) सर्वमङ्गम् (भद्रया) कल्याण्या क्रियया (पुनः) अवधारणे। द्वितीयवारे (संदधत्) संदधातु संयुनक्तु (परुषा) पर्वणा (परुः) पर्व। अन्यत् पूर्ववत् ॥