Atharvaveda / 4 / 14 / 4
स्व१॒॑र्यन्तो॒ नापे॑क्षन्त॒ आ द्यां रो॑हन्ति॒ रोद॑सी। य॒ज्ञं ये वि॒श्वतो॑धारं॒ सुवि॑द्वांसो वितेनि॒रे ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 14 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : bhRRiguH | Devta : aajyam, agniH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sva1ryanto naapekShanta aa dyaa.m rohanti rodasii. yaj~na.m ye vishvatodhaara.m suvidvaa.mso vitenire . 4.
Component Words : sva᳡H . yantaH . na . apa . iikShante . aa . dyaam . rohanti . rodasii iti . yaj~nam . ye . vishvataH.adhaaram . su.avidvaa.msaH . vi.atenire .14.4.
In Hindi:
ऋषि : भृगुः | देवता : आज्यम्, अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदपाठ : स्व᳡: । यन्त॑: । न । अप॑ । ई॒क्ष॒न्ते॒ । आ । द्याम् । रो॒ह॒न्ति॒ । रोदसी॒ इति॑ । य॒ज्ञम् । ये । वि॒श्वत॑:ऽधारम् । सुऽवि॑द्वांस: । वि॒ऽते॒नि॒रे ॥१४.४॥
पदार्थ : (ये) जो (सुविद्वांसः) बड़े विद्वान् योगी जन (द्याम्) अन्तरिक्ष और (रोदसी) सूर्य और पृथिवीलोक तक (आरोहन्ति) चढ़ते हैं, और जिन्होंने (विश्वतोधारम्) सब प्रकार से धारण शक्तिवाले (यज्ञम्) देव अर्थात् ब्रह्म के पूजन को (वितेनिरे) फैलाया है, वे ही योगी पुरुष (यन्तः न) चलते फिरते उद्योगी पुरुषों के समान (स्वः) सुखस्वरूप परब्रह्म को (अपेक्षन्ते) हृदय से चाहते हैं ॥४॥"
भावार्थ : जो विद्वान् योगी जन संसार के सब पदार्थों के विज्ञानी होकर परमात्मा की महिमा को विचारते हैं, वे ही उससे प्रीति करके आत्मबल पाकर यशस्वी होते हैं ॥४॥ यह मन्त्र यजुर्वेद में है-अ० १७ म० ६८ ॥
टिप्पणी :४−(स्वः) सुखस्वरूपं परब्रह्म (यन्तः) गच्छन्तः। उद्योगिनः पुरुषाः (न) इव-निरु० ३।१५। (अप ईक्षन्ते) अप+ईक्ष दर्शने। आकाङ्क्षन्ति। समालोकन्ते ते सुविद्वांसः (द्याम्) अन्तरिक्षम् (आ रोहन्ति) आरूढा भवन्ति ये सुविद्वांसः (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ च (यज्ञम्) देवस्य परब्रह्मणः पूजनम् (ये) (विश्वतोधारम्) सर्वतो धाराभिर्धारणशक्तिभिर्युक्तम् (सुविद्वांसः) सुष्ठु विशेषेण कर्मप्रकारं जानन्तः पण्डिता योगिनः (वितेनिरे) तनु-लिट्। विस्तारितवन्तः ॥