Atharvaveda / 4 / 15 / 9
आपो॑ वि॒द्युद॒भ्रं व॒र्षं सं वो॑ऽवन्तु सु॒दान॑व॒ उत्सा॑ अजग॒रा उ॒त। म॒रुद्भिः॒ प्रच्यु॑ता मे॒घाः प्राव॑न्तु पृथि॒वीमनु॑ ॥ 9॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 9
In English:
Seer : atharvaa | Devta : marudgaNaH | Metre : pathyaapa~NktiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aapo vidyudabhra.m varSha.m sa.m vo.avantu sudaanava utsaa ajagaraa uta. marudbhiH prachyutaa meghaaH praavantu pRRithiviimanu . 9.
Component Words : aapaH . vi.adyut . abhram . varSham . sam . vaH . avantu . su.adaanavaH . utsaaH . ajagaraaH . uta . marut.abhiH . pra.achyutaaH . meghaaH . pra . avantu . pRRithiviim . anu .15.9.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : मरुद्गणः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :
विषय : वृष्टि की प्रार्थना और गुणों का उपदेश।
पदपाठ : आप॑: । वि॒ऽद्युत् । अ॒भ्रम् । व॒र्षम् । सम् । व॒: । अ॒व॒न्तु॒ । सु॒ऽदान॑व: । उत्सा॑: । अ॒ज॒ग॒रा: । उ॒त । म॒रुत्ऽभि॑: । प्रऽच्यु॑ता: । मे॒घा: । प्र । अ॒व॒न्तु॒ । पृ॒थि॒वीम् । अनु॑ ॥१५.९॥
पदार्थ : (आपः) जलधारायें, (विद्युत्) बिजुली, (अभ्रम्) जल से भरा मेह (वर्षम्) बरसा और (सुदानवः) महादानी, (अजगराः) अजगर [समान स्थूल आकारवाले] (उत्साः) स्रोते (वः) तुम्हें (उत) अत्यन्त करके (सम्) यथावत् (अवन्तु) तृप्त करें। (मरुद्भिः) पवनों से (प्रच्युताः) चलाये गये (मेघाः) मेह (पृथिवीम्) पृथिवी को (अनु) अनुकूल (प्र) भले प्रकार (अवन्तु) तृप्त करें ॥९॥"
भावार्थ : जैसे जल, बिजुली आदि मिलकर जगत् का उपकार करते हैं, वैसे ही मनुष्य परस्पर मिलकर संसार का सुधार करें ॥९॥ मन्त्र ७ व ८ का मिलान करो ॥
टिप्पणी :९−(आपः) जलधाराः (विद्युत्) तडित् (अभ्रम्) उदकपूर्णो मेघः (वर्षम्) वृष्टिजलम् (प्र) प्रकर्षेण। अन्यद् यथा म० ७ ॥