Atharvaveda / 4 / 17 / 6
क्षु॑धामा॒रं तृ॑ष्णामा॒रम॒गोता॑मनप॒त्यता॑म्। अपा॑मार्ग॒ त्वया॑ व॒यं सर्वं॒ तदप॑ मृज्महे ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : shukraH | Devta : apaamaargo vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : kShudhaamaara.m tRRiShNaamaaramagotaamanapatyataam. apaamaarga tvayaa vaya.m sarva.m tadapa mRRijmahe . 6.
Component Words : kShudhaa.amaaram . tRRiShNaa.amaaram . agotaam . anapa.atyataam . apaamaargaH . tvayaa . vayam . sarvam . tat . apa . mRRijmahe .17.6.
In Hindi:
ऋषि : शुक्रः | देवता : अपामार्गो वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : क्षु॒धा॒ऽमा॒रम् । तृ॒ष्णा॒ऽमा॒रम् । अ॒गोता॑म् । अ॒न॒प॒ऽत्यता॑म् । अपा॑मार्ग: । त्वया॑ । व॒यम् । सर्व॑म् । तत् । अप॑ । मृ॒ज्म॒हे॒ ॥१७.६॥
पदार्थ : (क्षुधामारम्) भूख से मरना, (तृष्णामारम्) पियास से मरना, (अगोताम्) गौओं की हानि, और (अनपत्यताम्) बच्चों का अभाव, (तत् सर्वम्) इस सबको, (अपामार्ग) हे सर्वसंशोधक ! [वा अपामार्ग औषध के समान उपकारी राजन् !] (त्वया) तेरे साथ (वयम्) हम (अप मृज्महे) शोधते हैं ॥६॥"
भावार्थ : राजा के सुप्रबन्ध से सूखा के समय भी अन्न, जल, गौ, बैल आदि की बहुतायत से मनुष्य यथावत् बढ़ते रहते हैं ॥६॥ (अपामार्ग) का अर्थ सर्वथा संशोधक है, और एक औषध भी है, जिससे कफ, बवासीर, खुजली, उदररोग और विषरोग का नाश होता है ॥६॥
टिप्पणी :६−(क्षुधामारम्) मृञ्-घञ्। क्षुत्पीडया मरणम् (तृष्णामारम्) पिपासया मरणम् (अगोताम्) गवाम् अभावम् (अनपत्यताम्) अपत्यानां राहित्यम् (अपामार्ग) अप+आङ्+मृजू शौचालंकारयोः-घञ्। हे सर्वथा संशोधक। हे अपामार्गौषधवद् उपकारिन् ! अपामार्गपर्य्यायः-अपामार्गः शैखरिको धामार्गावमयूरकौ-इत्यमरः, १४।८८। अस्य गणाः। कफार्शः कण्डूदरामयविसषरोगनाशित्वम्-इति शब्दकल्पद्रुमः (त्वया) राज्ञा (वयम्) प्रजागणाः (सर्वम्) (तत्) एतत् [अपमृज्महे] अपमार्जयामः शोधयामः विनाशयामः-इत्यर्थः ॥