Atharvaveda / 4 / 23 / 4
सुजा॑तं जा॒तवे॑दसम॒ग्निं वै॑श्वान॒रं वि॒भुम्। ह॑व्य॒वाहं॑ हवामहे॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 23 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : mRRigaaraH | Devta : prachetaa agniH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sujaata.m jaatavedasamagni.m vaishvaanara.m vibhum. havyavaaha.m havaamahe sa no mu~nchatva.mhasaH . 4.
Component Words : su.ajaatam . jaata.avedasam . agnim . vaishvaanaram . vi.abhum . havya.avaaham . havaamahe . saH . naH . mu~nchatu . a.mhasaH .23.4.
In Hindi:
ऋषि : मृगारः | देवता : प्रचेता अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदपाठ : सुऽजा॑तम् । जा॒तऽवे॑दसम् । अ॒ग्निम् । वै॒श्वा॒न॒रम् । वि॒ऽभुम् । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ । स: । न॒: । मु॒ञ्च॒तु॒ । अंह॑स: ॥२३.४॥
पदार्थ : (सुजातम्) बड़े प्रसिद्ध, (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों के जाननेवाले अथवा धन प्राप्त कराने हारे (वैश्वानरम्) सब नरों [नायकों] के हित करनेवाले, (विभुम्) सर्वशक्तिमान्, (हव्यवाहम्) उत्तम अन्न पहुँचानेवाले (अग्निम्) सर्वव्यापक परमेश्वर को (हवामहे) हम पुकारते हैं, (सः) वह (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतु) छुड़ावे ॥४॥"
भावार्थ : परमेश्वर के गुण और कर्मों को जानकर मनुष्य अपना सामर्थ्य बढ़ावें और परस्पर उपकार करके आनन्दित रहें ॥४॥
टिप्पणी :४−(सुजातम्) जनी प्रादुर्भावे-क्त। सुप्रसिद्धम् (जातवेदसम्) म० २। जातानां वेदितारम्। धनस्य जनयितारं प्रापकम्। (अग्निम्) सर्वव्यापकम् (वैश्वानरम्) अ० १।१०।४। सर्वेषां नराणां नायकानां हितम् (विभुम्) विप्रसंभ्यो ड्वसंज्ञायाम्। पा० ३।२।१८०। इति वि+भू डु। सर्वगतम्। प्रभुम् (हव्यवाहम्) हव्यं वहतीति। हव्य+वह-अण्। अन्नप्रापकम् (हवामहे) आह्वयामः। अन्यद् गतम् ॥