Atharvaveda / 4 / 26 / 4
ये अ॒मृतं॑ बिभृ॒थो ये ह॒वींषि॒ ये स्रो॒त्या बि॑भृ॒थो ये म॑नु॒ष्या॑न्। द्यावा॑पृथिवी॒ भव॑तं मे स्यो॒ने ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : mRRigaaraH | Devta : dyaavaapRRithivii | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ye amRRita.m bibhRRitho ye havii.mShi ye srotyaa bibhRRitho ye manuShyaan. dyaavaapRRithivii bhavata.m me syone te no mu~nchatama.mhasaH . 4.
Component Words : ye iti . amRRitam . bibhRRithaH . ye iti . haviiShi . ye iti . srotyaaH . bibhRRithaH . ye iti . manuShyaa᳡n . dyaavaapRRithivii iti . bhavatam . me . syone iti . te iti . naH . mu~nchatam . a.mhasaH .26.4.
In Hindi:
ऋषि : मृगारः | देवता : द्यावापृथिवी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : सूर्य और पृथिवी के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ये इति॑ । अ॒मृत॑म् । बि॒भृ॒थ: । ये इति॑ । ह॒वीषि॑ । ये इति॑ । स्रो॒त्या: । बि॒भृ॒थ: । ये इति॑ । म॒नु॒ष्या᳡न् । द्यावा॑पृथिवी॒ इति॑ । भव॑तम् । मे॒ । स्यो॒ने इति॑ । ते इति॑ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२६.४॥
पदार्थ : (ये) जो तुम दोनों (अमृतम्) मृत्यु से बचने के साधन और (ये) जो तुम (हवींषि) देने और ग्रहण करने योग्य अन्न आदि पदार्थों को (बिभृथः) धारण करती हो, (ये) जो तुम दोनों (स्रोत्याः) जल वा नदियों को और (ये) जो तुम दोनों (मनुष्यान्) मनुष्यों को (बिभृथः) धारण करती हो। (द्यावापृथिवी) हे सूर्य और पृथिवी ! तुम दोनों (मे) मेरे लिये (स्योने) सुखवती (भवतम्) होओ। (ते) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥४॥"
भावार्थ : सूर्य और पृथिवी के परस्पर आकर्षण से वृष्टि होकर अन्न आदि उत्पन्न होते हैं, जिन से मनुष्य आदि प्राणियों को अमृत अर्थात् अन्न आदि पदार्थ मिलते हैं ॥४॥
टिप्पणी :४−(ये) द्यावापृथिव्योर्युवाम् (अमृतम्) नास्ति मृतं मरणं यस्मात् तत्। मरणाद्रक्षणसाधनम्। अन्नादिकम् (बिभृथः) धारयथः (हवींषि) अर्चिशुचिहु०। उ० २।१०८। इति हु दानादानादनतर्पणेषु-इसि। देवग्राह्यद्रव्याणि धान्यादीनि (स्रोत्याः) स्रोतसो विभाषा ड्यड्ड्यौ। पा० ४।४।११३। इति स्रोतस्-ड्य। स्रोतसि भवाः। अपो जलानि। स्रोत्याः, नदीनाम-निघ० १।१३। (मनुष्यान्) मननशीलान् नरान्। अन्यत् पूर्ववत्-म० २ ॥