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Atharvaveda / 4 / 26 / 6

ये की॒लाले॑न त॒र्पय॑थो॒ ये घृ॒तेन॒ याभ्या॑मृ॒ते न किं च॒न श॑क्नु॒वन्ति॑। द्यावा॑पृथिवी॒ भव॑तं मे स्यो॒ने ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : मृगारः | देवता : द्यावापृथिवी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : सूर्य और पृथिवी के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : ये इति॑ । की॒लाले॑न । त॒र्पय॑थ: । ये इति॑ । घृ॒तेन॑ । याभ्या॑म्‌ । ऋ॒ते । न । किम् । च॒न । श॒क्नुवन्ति॑ । द्यावा॑पृथिवी॒ इति॑ । भव॑तम् । मे॒ । स्यो॒ने इति॑ । ते इति॑ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२६.६॥

पदार्थ : (ये) जो तुम दोनों (कीलालेन) जाठराग्नि के निवारण करनेवाले अन्न से, और (ये) जो तुम दोनों (घृतेन) जल से (तर्पयथः) तृप्त करती हो, (याभ्याम् ऋते) जिन तुम दोनों के बिना [सब प्राणी] (किम् चन) कुछ भी (न) नहीं (शक्नुवन्ति) शक्ति रखते हैं। (द्यावापृथिवी) हे सूर्य और पृथिवी ! (मे) मेरे लिये (स्योने) सुखवती (भवतम्) हो। (ते) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥६॥"

भावार्थ : सूर्य और पृथिवी के प्रभाव से अन्न और जल आदि पदार्थ उत्पन्न होकर जगत् का उपकार करते हैं। उनके विज्ञान से सब मनुष्य सुखी रहें ॥६॥

टिप्पणी :६−(ये) युवाम् (कीलालेन) कील-अलेन। कील बन्धने खण्डने च घञ् क वा। अल निवारणे-अण्। कीलं जाठराग्नेर्ज्वालामलति वारयतीति। कीलालम् अन्नम्-निघ० २।७। अन्नेन (तर्पपथः) (घृतेन) उदकेन निघ० १।१२। (याभ्याम्) अन्यारादितरर्ते०। पा० २।३।२९। इति पञ्चमी (ऋते) विना (न) निषेधे (किञ्चन) यथातथा। किमपि (शक्नुवन्ति) शक्ता भवन्ति सर्वे जनाः। अन्यत् पूर्ववत्। म० २ ॥